युवा पीढ़ी पर चलचित्रों का प्रभाव निबंध

युवा पीढ़ी पर चलचित्रों पर प्रभाव

चलचित्रों का प्रभाव युवा पीढ़ी, बच्चों एवं अन्य उम्र वाले लोगों के साथ निबंध का संछिप्त परिचय

चलचित्रों का युवा पीढ़ी,बच्चों या अन्य उम्र के लोगों के साथ अच्छा प्रभाव भी हो सकता है। और बुरा प्रभाव भी हो सकता है। इसको उपयोग करने पर निर्भर करता है। यदि सही तरीका से इसको उपयोग किया जाए तो अच्छा प्रभाव पड़ेगा और गलत तरीके से इसका उपयोग किया जाए तो उन पर बुरा प्रभाव पड़ेगा नीचे इसके बारे में विस्तार से बताया गया है। आप और भी अधिक जानकारी प्राप्त करना चाहते हैं। तो इस ब्लॉग को जरूर पढ़े और अच्छा लगे तो अपने दोस्तों के साथ जरूर साझा करें।

चलचित्रों का प्रभाव कारी साधन के रूप में भूमिका

चलचित्र आज भारत का सर्वाधिक लोकप्रिय मनोरंजन का साधन है। नवयुवक जो चलचित्रों पर जाने देते हैं। मनोरंजन के साथ-साथ मानव-हृदय पर गहरी छाप भी छोड़ता है। चलचित्र में भावनापूर्ण कहानियाँ होती हैं। जो हमारी भावनाओं को उत्तेजित करके अपना असर दिखाती हैं। कोई भी व्यक्ति इनके प्रभाव से अछूता नहीं रह सकता। 

चलचित्र के प्रकार

  • रोमांचकारी
  • भूतिया
  • विज्ञान पर आधारित
  • सुपर हिरो
  • एक्शन
  • कार्टून
  • कहानियां
  • प्रेरणादायक इसी तरह अनेक प्रकार है

चलचित्र देखने का माध्यम

  • मोबाइल
  • लैपटॉप
  • टैबलेट
  • टीवी
  • सिनेमा हॉल
  • थियेटर

चलचित्रों का प्रभाव अच्छा रूप में

भारत छुआ-छूत, जाति-पाँति, ऊँच-नीच, दहेज, बाल-विवाह, अनमेल विवाह आदि कई समस्याओं से अब भी जकड़ा हुआ है। चलचित्र इन बुराइयों को दूर करने में बहुत बड़ी भूमिका अदा कर सकते हैं। पहले भी चलचित्रों ने इन बुराइयों को दूर करने में बहुत योगदान दिया है। चलचित्र हमारी मानसिक रूढ़ियों को तोड़ने में बहुत सहायक सिद्ध हुए हैं।

पिछले बीस-बीस वर्षों में देश में जितने प्रेम-विवाह और अंतर्जातीय विवाह होने शुरू हुए हैं। इतने पहले कभी नहीं होते थे। उसका कारण है-चलचित्र । चलचित्रों ने मानव को जाति-बंधन से ऊपर उठाने का सफल प्रयास किया है। इसी भाँति सास के दुर्व्यवहार का भंडाफोड़ करने के लिए कई फिल्में बनी हैं। अनेक फिल्मों में दहेज की बुराइयों को दिखाया गया है। झाँसी की रानी, शहीद भगतसिंह आदि चलचित्र देशभक्ति की भावना पैदा करने में सफल सिद्ध हुए हैं। 

चलचित्रों का प्रभाव बुरा रूप में

चलचित्रों ने जहाँ समाज में एक नवचेतना जाग्रत की है।  वहाँ उन्होंने समाज को अत्यधिक हानि भी पहुंचाई है। धन के लोभी फिल्मों के निर्माता ऐसी फिल्मों का निर्माण करते हैं। जिनमें मार-धाड़, हिंसा, यौन-प्रदर्शन तथा अश्लीलता को जान-बूझ कर उभारा जाता है। उन चलचित्रों को देख कर मानव की कुप्रवृतियाँ जाग्रत होने लगती हैं। पाश्चात्य देशों में आज यही कुछ हो रहा है। जिसका स्पष्ट प्रभाव अब भारत वर्ष में भी देखा जा सकता है।

अनेक सर्वेक्षणों से पता चलता है, कि अपराधों की संख्या बढ़ने से इन्हीं फिल्मों का अधिक हाथ होता है। विश्व-भर में एक लाख से भी अधिक बच्चों के संबंध में किए गए सर्वेक्षणों ने एक मत से स्वीकारा है, कि बच्चा चलचित्र के पर्दे पर हिंसा और अपराधों की जितनी कहानियाँ के लिए पाठशाला के समान हो गए हैं।  अपराधी वृत्ति के लोग जेब काटने, डाका डालने, चोरी करने, किसी का शील भग करने तथा अन्य बुराइयाँ करने के नित-नये तरीके चलचित्रों के माध्यम से सीखते हैं। 

निष्कर्ष- 

निष्कर्ष के तौर पर यह ठीक है, कि आज चलचित्रों से मानव-मूल्य नष्ट होने लगे हैं। लोगों का दृष्टिकोण भद्दा होने लगा है, तथा जीवन के प्रति उनकी आस्था घटने लगी है। फैशन के कीटाणु भी समाज को गिराने लगे हैं, तथा फलस्वरूप अश्लीलता और नग्नता को बढ़ावा मिला है। परंतु इसमें कोई संदेह नहीं कि चलचित्र ऊँचा उठा सकता है। चलचित्र हमारे हाथ में एक महत्वपूर्ण साधन है। हम चाहें जो उससे देवता निर्माण कर लें, चाहें तो दस्यु। 

उपसंहार


आज किसी भी राष्ट्र के नायकों और समाज के पथ प्रदर्शकों को तथा फिल्म निर्माताओं को इस चीज को ध्यान में रखना
होगा।  इस चलचित्र लोकप्रिय माध्यम का उपयोग राष्ट्रीय भावना उत्पन करने तथा लोगों के चरित्र निर्माण के लिए किया जाना चाहिए । देश में बढ़ती हुई जनसंख्या साथ में बढ़ते हिंसा, क्राइम, दंगा, अराजकता तथा अनेक अपराधों और अनैतिक कार्यों को इससे जनता के सम्मुख रख कर इससे दूर रहने की प्रेरणा दी जा सकती है। युवा पीढ़ी, बच्चे, एवं अन्य आयु वर्ग को भी इससे सृजनात्मक पक्ष के रूप में इनसे सीखना चाहिए।

यदि इसके निर्माता इस बात को भी समझें कि राष्ट्र और जन-जीवन के प्रति भी वे उत्तरदायी हैं। तो अच्छी और राष्ट्रीय स्तर की फिल्मों को प्रोम्साहन देना तथा बुरे फिल्मों को प्रतिबंधित करना हमारी सरकार का कर्तवय है।हमारे भारतीय संस्कृति के आदर्श तथा वर्तमान विश्व की स्थिति को सिनेमा अच्छे ढंग से लोगों तक प्रस्तुत करे, तो इससे शांति, समृद्धि, सुख और समता के आदर्श को हर उम्र के लोगो के बीच आसानी स्थापित किया जा सकता है।

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