योगासन एवं स्वास्थ्य पाठ 2 नैतिक शिक्षा क्लास 8 प्रश्नोतर l Ncert Solution For Class 8th

0

योगासन एवं स्वास्थ्य पाठ 2 नैतिक शिक्षा क्लास 8 प्रश्नोतर l Ncert Solution For Class 8th moral education के इस ब्लॉग पोस्ट में आप सभी विद्यार्थियों का स्वागत है, इस पोस्ट के माध्यम से पाठ से जुड़ी हर तरह की प्रश्नों के उत्तर आप सभी को इस पोस्ट पर अध्ययन करने के लिए मिलेगा जो परीक्षा की दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण है, और दैनिक जीवन में भी इनका काफी उपयोग होता है, इसलिए पोस्ट पर दिए गए सभी प्रश्नों की उत्तर को ध्यान से पढ़ें ताकि आपको काफी मदद मिल सके तो चलिए शुरू करते हैं-

योगासन एवं स्वास्थ्य पाठ 2 नैतिक शिक्षा क्लास 8 वस्तुनिष्ट प्रश्नोतर l Ncert Solution For Class 8th moral education

सही विकल्प का चयन करें-

1 सूर्य नमस्कार हमें कितनी बार करना चाहिए?
(a) सात.
(b) नौ.
(c) तेरह,
(d) दस
उत्तर-(c)

2 योगासन किनसे सीखना चाहिए?
(a) पुस्तकों से,
(b) योग शिक्षक से.
(c) स्वयं से.
(d) इनमें कोई नहीं।
उत्तर-(b)

3 स्मरण-शक्ति बढ़ाने के लिए कौन-सा आसन लाभदायक है?
(a) पद्मासन एवं शीर्षासन,
(b) झूलासन )
(c) सर्वांगासन.
(d) पवनमुक्तासन।
उत्तर-(a)

4 किन आसन में रक्त का प्रवाह विपरीत दिशा में होने लगता है?
(a) पद्मासन,
(b) शीर्षासन
(c) पवनमुक्तासन,
(d) सर्वांगासन।
उत्तर-(b)

5 योगासन किस अवस्था में करना चाहिए?
(a) बाल्यावास्था.
(b) युवावस्था,
(c) वृद्धावस्था,
(d) इन सभी अवस्थाओं में।
उत्तर-(d)

6 सूर्य नमस्कार की कितनी स्थितियाँ है ?
(a) 10,
(b) 08.
(c) 12,
(d) 16
उत्तर-(c)

योगासन एवं स्वास्थ्य पाठ 2 नैतिक शिक्षा क्लास 8 लघु उत्तरीय प्रश्नोतर l Ncert Solution For Class 8th moral education

निम्नांकित प्रश्नों के उत्तर लिखें-

1 योग क्या है? इसके कौन-कौन से अंग है ?
उत्तर-योग अपनी चित्तवृत्तियों को काबू में रखकर आत्मा को परमात्मा से जोड़ने का साधन है। यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारण, ध्यान एवं समाधि-योग के कुल आठ अंग हैं।

2. योगासन से हमें क्या लाभ मिलता है ?
उत्तर-योगासन से तन स्वस्थ एवं रोगमुक्त बनता है तथा मन विकार रहित हो जाता है।

3 गोरक्षासन एवं शीर्षासन की विधि एवं लाभ का वर्णन करें।
उत्तर-गोरक्षासन की विधि- दरी या जमीन पर बैठ कर अपने पैर सामने की ओर फैला दें। अब दोनों पैरों को मोड़कर तलवे को आपस में मिला दें। दोनों हाथों को दोनों घुटनों पर रखें और
उसी अवस्था में एड़ियों पर बैठ जाएँ। मेरूदंड एवं गर्दन सीधा रखें तथा घुटनों को जमीन से ऊपर उठने न दें।

गोरक्षासन के लाभ- इससे शरीर के अनेक रोग नष्ट होते हैं एवं शारीरिक बल बढ़ता है। यह आसन विद्यार्थियों के लिए अति लाभदायक है।

शीर्षासन की विधि-सिर तथा हाथों के बल पर पाँव ऊपर करके उल्टा खड़ा होना शीर्षासन कहलाता है। सिर के नीचे मुलायम कपड़ा या तौलिया रखा जाता है। शुरू-शुरू में मुलायम गद्दे पर तथा दीवार के सहारे इस आसन को करना चाहिए। इस आसन को प्रारंभ में आधा या एक मिनट से अधिक नहीं करना चाहिए। अभ्यास करके इसे पन्द्रह मिनट तक किया जा सकता है।

शीर्षासन में रक्त का प्रवाह विपरीत दिशा में होने लगता है। अतः नियम यह है कि जितनी देर शीर्षासन किया गया है उतनी ही देर हाथ ऊपर करके सीधा खड़ा रहना आवश्यक है।

शीर्षासन के लाभ- शीर्षासन से स्मरण शक्ति बढ़ती है। छाती एवं नेत्रों की दुर्बलता दूर होती है। यह पेट के रोगों को ठीक करता है एवं पेट फुलने से बचाता है।

4 विद्यार्थियों के लिए लाभकारी आसनों की सूची बनाएँ। इनको दैनिक जीवन में अपनाएँ एवं प्राप्त होने वाले लाभों की चर्चा अपने साथियों के साथ करें।
उत्तर-निम्नांकित आसन लाभकारी होते हैं-
(क) पद्मासन,
(ख) झूलासन,
(ग) गोरक्षासन,
(घ) शीर्षासन,
(ङ) पवन मुक्तासन।

हम इन आसनों को अपनाकर इससे होने वाले निम्नांकित लाभों को प्राप्त कर सकते है-

पढ़ाई पर ध्यान केन्द्रित होता है। पेट के गैस एवं अन्य रोगों से छुटकारा मिलता है। आँखों की रोशनी बढ़ती है। विभिन्न अंगों में ताकत एवं स्फूर्ति आती है। मन-चित्त शुद्ध एवं शांत होता है। ईर्ष्या द्वेष की भावना कम होती है, आदि।

निम्नांकित आसन की विधि और लाभ बताएँ-
(क) सूर्य नमस्कार,
(ख) शीर्षासन,
(ग) पद्मासन,
(घ) झूलासन,
(ङ) गोरक्षासन,
(च) पश्चिमोत्तानासन,
(छ) पवनमुक्तासन,
(ज) सर्वांगासन।
उत्तर-(क) सूर्यनमस्कार की विधि-

Surya-Namaskar-Kya-Hai class 8th

सूर्यनमस्कार 12 स्थितियों (आसनों) को लगातार करके पूर्ण करने से एक बार पूर्ण होता है। बारहों स्थितियों को पूर्ण करने की क्रियाविधि निम्न है-

(i) अपने दोनों पंजे जोड़कर खड़े हो जाएँ। श्वास लेते हुए दोनों हाथ बगल से ऊपर उठाएँ और श्वास छोड़ते हुए एवं हथेलियों को जोड़ते हुए छाती के सामने प्रणाम की मुद्रा में ले आएँ।

(ii) श्वास लेते हुए एवं हाथों को उठाते हुए ऊपर उठाएँ एवं पीछे ले जाएँ। इस क्रम में एड़ियों से लेकर उंगलियों तक सभी अंगों को ऊपर की तरफ खींचने का प्रयास करें।

(iii) श्वास छोड़ते हुए तथा रीढ़ की हड्डी को सीधी रखते हुए कमर से आगे झुकें। पूरी तरह श्वास
छोड़ते हुए दोनों हथेलियाँ जमीन पर रखें।

(iv) श्वास लेते हुए जितना संभव हो दाहिना पैर पीछे ले जाएँ, दाहिने घुटने को जमीन पर रख दृष्टि को ऊपर की ओर ले जाएँ।

(v) श्वास लेते हुए बाएँ पैर को पीछे ले जाएँ और सम्पूर्ण शरीर को सीधी रेखा में रखें।

(vi) दोनों घुटने जमीन पर लाएँ और श्वास छोड़ें। अपने कूल्हों को पीछे ऊपर की ओर उठाएँ। पूरे शरीर को आगे की ओर खिसकाएँ तथा छाती और ठुड्ढी से जमीन को छुएँ।

(vii) अब भुजंगासन में छाती को ऊपर उठाएँ। कंधे कानों से दूर और दृष्टि ऊपर की ओर रखें।

(vii)श्वास छोड़ते हुए कूल्हों और रीढ़ की हड्डी के निचले भाग को ऊपर उठाएँ, छाती को नीचे झुकाकर उलटा वी (A) आकार में आ जाएँ।

(ix) श्वास लेते हुए दाहिने पैर दोनों हाथों के बीच में ले जाएँ और दृष्टि ऊपर की ओर रखें।

(x) श्वास छोड़ते हुए बाएँ पैर को आगे लाएँ, हथेलियों को जमीन पर ही रहने दें।

(xi) श्वास लेते हुए एवं हाथों को सीधा रखते हुए खड़े हो जाएँ। हाथों को ऊपर और पीछे की ओर ले जाएँ तथा कूल्हों आगे की ओर धकेलें।

(xii) श्वास छोड़ते हुए पहले शरीर को सीधा करें फिर हाथों को नीचे लाएँ। इसी अवस्था में विश्राम करें और शरीर में हो रही संवेदनाओं को महसूस करें।

लाभ- शरीर स्वस्थ रहता है और मन प्रसन्न होता है। आत्मविश्वास में वृद्धि होती है एवं स्मरण शक्ति बढ़ती है।

(ख) शीर्षासन की विधि- सिर के नीचे मुलायम कपड़ा रख कर सिर तथा हाथों के बल पर पाँव ऊपर करके उल्टा खड़ा होते हैं। आधा या एक मिनट से शुरू करके नियमित अभ्यास से 15 मिनट तक किया जा सकता है। इस आसन में रक्त का प्रवाह विपरीत दिशा में होने लगता है इसलिए जितनी देर शीर्षासन किया गया है उतनी ही देर हाथ ऊपर कर सीधा खड़ा रहना आवश्यक है।

लाभ- शीर्षासन से स्मरण शक्ति बढ़ती है। छाती एवं नेत्र की निर्बलता दूर होती है तथा पेट के रोगों को ठीक कर पेट को फुलने से बचाता है।

(ग) पदमासन की विधि- पदमासन में दोनों पाँव को परस्पर जाँघों पर रख कर हाथों को घुटनों पर सीधा रखा जाता है तथा दृष्टि सामने स्थिर रहती है।

लाभ- इससे मन शुद्ध होता है तथा स्मरण शक्ति में अद्भुत लाभ होता है।

(घ) झूलासन की विधि- पद्मासन में बैठे हुए ही दोनों हाथों के पंजे जमीन पर रख लेते हैं। फिर पंजों के बल शरीर को ऊपर उठाकर झुलाते हैं।

लाभ- पद्मासन के लाभ के साथ-साथ हाथों की शक्ति बढ़ती है तथा पेट के विकारों का नाश होता है।

(ङ) गोरक्षासन की विधि- दरी या जमीन पर बैठ कर अपने पैर सामने की ओर फैला देते हैं। अब दोनों पैरों को मोड़कर तलवे आपस में ला दिया जाता है। दोनों हाथों को घुटने पर रख कर उसी अवस्था में एड़ियों पर बैठ जाते हैं। मेरुदंड एवं गर्दन सीधी रखते हैं तथा घुटनों को जमीन से ऊपर उठने नहीं देते हैं।

लाभ- इससे शरीर के अनेक रोग नष्ट होते हैं तथा शारीरिक बल बढ़ता है। यह आसन विद्यार्थियों के लिए अत्यंत लाभकारी है।

(च) पश्चिमोत्तानासन की विधि- दोनों पैरों को दोनों हाथों से पकड़कर नाक या माथा से घुटनों को स्पर्श किया जाता है।

लाभ- पीठ तथा पेट के रोग समाप्त होते हैं। आँत बढ़ती है। शरीर स्वस्थ रहने से काम करने की शक्ति भी बढ़ती है।

(छ) पवनमुक्तासन की विधि- सीधे लेटकर एक घुटने को मोड़कर पेट के साथ मिलाते हैं। फिर दोनों हाथों से घुटने को पकड़कर मुँह से घुटने को चूमते हैं । यही प्रक्रिया दूसरे घुटने तथा फिर दोनों घुटनों से की जाती है।

लाभ- पेट की गैस से छुटकारा मिलता है।

(ज) सर्वांगासन की विधि- सीधे लेटकर दोनों हाथों की सहायता से कमर और पैरों को ऊपर उठाया जाता है फिर गर्दन पर दबाव के साथ पूरा शरीर ऊपर उठा दिया जाता है। दोनों पैरों को घुमाकर सिर के पीछे जमीन को स्पर्श करना सर्वांगासन का एक अन्य प्रकार है।

लाभ- इस आसन से हृदय तथा फेफड़े पुष्ट होते हैं। सर दर्द, कफ, उदर रोग एवं नेत्र रोग में यह लाभकारी है। यह मस्तिष्क की शक्ति बढ़ाता है तथा मेरूदंड को लचीला कर शरीर को बल तथा स्फूर्ति देता है।

6 इंद्रियाँ क्या हैं ? वर्णन करें।
उत्तर-शरीर के जिन अंगों से किसी वस्तु के छूने, चखने, सूंघने, देखने और सुनने का ज्ञान होता है, इन्हें ‘इंद्रियाँ’ कहते हैं। ये हैं-

(i) स्पर्शन (त्वचा से संबंधित)- हाथ-पैर या शरीर के किसी अन्य अंग जिससे किसी वस्तु को छूकर जाना जाता है, उसे स्पर्शन इंद्रिय कहते हैं। जैसे- आग गर्म है, बर्फ ठंडी है, रूई हल्की है, लोहा भारी है, मोम चिकना है, फर्श कड़ा है, आदि।

(ii) रसना (जिह्वा या जीभ से संबंधित)- शरीर के जिस अंग से किसी वस्तु को चखकर उसका स्वाद जाना जाता है, उसे जीभ या रसना इंद्रिय कहते हैं। जैसे- चीनी मीठी है, नींबू खट्टी है, दवाई कड़वी है, मिर्च तीखी है, आदि।

(iii) घ्राण (नाक से संबंधित)- शरीर के जिस अंग द्वारा किसी वस्तु को सूंघकर उसकी खुशबू या बदबू जानी जाती है, उसे घ्राण इंद्रिय कहते हैं। जैसे- चमेली के फूल से खुशबू और मिट्टी के तेल से बदबू आती है।

(iv) चक्षु (आँख से संबंधित)- शरीर के जिस अंग से रंग, रूप और आकार आदि का ज्ञान होता है, उसे चक्षु इंद्रिय कहते है। जैसे- गेंदे का फूल पीला है, गुलाब का फूल लाल है, तोता हरा है, आकाश नीला है, कोयल काली है, पहाड़ ऊँचा है, गाय के चार पैर हैं, आदि।

(v) कर्ण (कान से संबंधित)- शरीर के जिस अंग से आवाज सुनाई दे, उसे कर्ण इंद्रिय कहते हैं। जैसे- रोने की आवाज, हँसने की आवाज, बाजे की आवाज, एवं चिड़ियों के चहकने की आवाज का सुनना।jac board