विद्यार्थी और अनुशासन

परिचय

विद्यार्थी और अनुशासन के इस निबंध के माध्यम से हम आज जानेंगे की विद्यार्थी के लिए अनुशासन का होना कितना जरुरी है।  ,अनुशासन केवल विद्यार्थी के लिए भर जरुरी नहीं है । बल्कि सभी मानव जाति के जीवन के लिए भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है । आज हम इस निबंध के जरिये निम्न बिन्दुओ पर चर्चा करेंगे –

  • अनुशासन से अभिप्राय,
  •  अनुशासन का महत्त्व, 
  • अनुशासनहीनता का कारण, 
  • निष्कर्ष।

अनुशासन से अभिप्राय

 अनुशासन जीवन की नियंत्रित व्यवस्था है। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में और हर मनुष्य में अनुशासन का होना वांछित है। विद्यार्थियों में अनुशासन की अनिवार्यता है। इसके अभाव में भाव-प्रवण, अपरिपक्व विद्यार्थी अपने श्रेय पथ से भटक सकते हैं। 

अनुशासन क्यों जरुरी है ?

विद्यार्थी और अनुशासन नामक निबंध में हु जानेंगे की अनुशासन लोगों के लिए क्यों जरुरी है। किसी समाज के निर्माण में अनुशासन का बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका होती है। अनुशासन ही एक ऐसा संस्कार है जो मनुष्य को श्रेष्ठता प्रदान करने में उनकी मदद करता है तथा उन्हें समाज में अच्छा जगह दिलाने में काफी हद तक सहायता प्रदान करता है। कहा जय तो अनुशासन हम प्रत्येक मनुष्य के विकास के लिए बहुत ही आवश्यक है। यदि हर मनुष्य अनुशासन में जीवन−यापन करता है, तो वह स्वयं अपने आप के लिए सुखद और अच्छा भविष्य की रास्तातय करने लग जाता है ।

अनुशासन का महत्त्व

विद्यार्थी-जीवन जीवन का ऊषा काल है। यहाँ से ज्ञान की रश्मियाँ फूट कर सम्पूर्ण जीवन को अलोकित करती हैं। जीवन के निर्माण-काल में अगर अनुशासनहीनता हो तो भावी जीवन के रंगीन सपने पूरे नहीं हो पाते हैं। जीवन के इस काल में विद्यार्थियों के जो संस्कार बनेंगे वे स्थायी हो जाएगे। अतः सावधानी की अत्यन्त आवश्यकता है। स्पष्ट है कि भावी जीवन की आधारशिला दृढ़ हो।

विद्यार्थी और अनुशासन, लाभ

अनुशासन का हमारे दैनिक जीवन में कई सारे लाभ है, अनुशासन ना केवल हमारे दैनिक जीवन की प्रत्येक क्षेत्र में लाभ दिलाता है। साथ ही समाज या हर जगह सम्मान भी दिलाता है, पढ़ाई या अध्ययन ,व्यवहार, बात-चित ,खेल-कूद ,व्यायाम, शासनऔर अन्य कई सारे अन्य कार्य आदि में काफी लाभ दिलाता है ।अनुशासन के द्वारा ही हम हमारे जीवन में तन मन से स्वस्थ रख सकते हैं अनुशासन द्वारा ही हम उच्च आदर्शो को व्यक्ति अपने जीवन में पाता है। अनुशासन ही उसे ज्ञान प्रदान करता हैं ।शुद्ध मन और बुद्धि से ही ज्ञान का हमारे जीवन में संचार होता है ।और इसमें अनुशासन का एक महत्वपूर्ण योगदान रहता ही है।

अनुशासनहीनता का कारण

विद्यार्थी और अनुशासनआज विद्यार्थी-जीवन की जो दशा है।  उसके लिए समाज का कलुषित वातावरण उत्तरदायी है। विद्यार्थी जन्मना उच्छृखल और अनुशासनहीन नहीं होते। वे अपने परिवेश की उपज है।आज की शिक्षा-प्रणाली कम दूषित नहीं है। यह प्रणाली चरित्र-निर्माण, उच्च संस्कार और उच्चतर जीवन मूल्यों की स्थापना के लिए प्रयास नहीं करती है। अध्यापकों के आचरण में जीवन के महान गुण दिखाई नहीं पड़ती हैं।

फिर विद्यार्थियों पर किनके गुणों का प्रभाव पड़े? विद्यार्थियों के सम्मुख त्याग, तपस्या, सदाचार और उच्च जीवन मूल्यों का कोई निदर्शन नहीं मिल पाता है। उनके गुरू आदर्श जीवन के उदाहरण प्रस्तुत कर नहीं पाते हैं। इस तरह हम कह सकते है, कि त्रुटिपूर्ण शिक्षा प्रणाली, पश्चिमी सभ्यता की चकाचौंध, दूरदर्शन एवं चलचित्र सब विद्यार्थियों में अनुशासनहीनता के कारक तत्त्व हैं। दूरदर्शन के चलते सांस्कृतिक प्रदूषण एवं चलचित्रों के कारण अपराधीकरण को बल मिल रहा है।

इस कारणों से नवयुवकों में रूचि-विकृति पैदा हो रही है। हमारे देश की दलगत राजनीति ने भी नवयुवकों को गुमराह किया है। हर दल अपने स्वार्थ की पूर्ति में युवा समाज का अनुचित दोहन कर रहा है। दलों के युवक-मंचों का गठन विद्यार्थियों को अंतर्मुक्ता करके किया जाता है। छात्र समाज भी अलग-अलग राजनीतिक दलों के प्रति निष्ठा के कारण विभक्त हैं। इन कारणों से पहले की तुलना में अनुशासनहीनता बढ़ी है। 

उपसंहार

 विद्यार्थी और अनुशासन के निबंध में विद्यार्थियों में बढ़ती अनुशासनहीनता देश के भविष्य के लिए गंभीर खतरा है। इससे सामजिक शांति भंग होगी और अपराधमूलक घटनाओं में वृद्धि होगी। दिशाहीन युवा-समाज अराजकता पर उतर आएगा। अतः उन्हें अनुशासित करने के लिए गंभीर कदम उठाने होंगे। बहुमुखी प्रयास होने पर ही विद्यार्थियों में अनुशासन बना रहेगा। स्वयं विद्यार्थियों को भी अनुशासन की आवश्यकता समझते हए आवश्यक कदम उठाने होंगे। जिस पीढ़ी पर देश के भविष्य का दारोमदार निर्भर है। उसे स्वस्थ एवं संयत बनाना ही होगा।