शिल्प और उद्योग पाठ 5 दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर |Ncert Solution For Class 8th history

0

शिल्प और उद्योग पाठ 5 दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर |Ncert Solution For Class 8th history के इस ब्लॉग पोस्ट में आप सभी विद्यार्थियों का स्वागत है, इस पोस्ट के माध्यम से आप सभी विद्यार्थियों को पाठ से जुड़ी सभी महत्वपूर्ण दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर के उत्तर इस ब्लॉग पोस्ट में पढ़ने के लिए मिलेगा, जोकि काफी महत्वपूर्ण है, और इस तरह के प्रश्न पिछले कई परीक्षाओं में पूछे जा चुके हैं, इसलिए आप इस पोस्ट को जरूर पूरा करें ताकि आपकी परीक्षा की तैयारी करने में आपके लिए मददगार साबित हो सके-

शिल्प और उद्योग पाठ 5 दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर Ncert Solution For Class 8th history

शिल्प और उद्योग पाठ 5 अति लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर
शिल्प और उद्योग पाठ 5 लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर
शिल्प और उद्योग पाठ 5 दीर्घ लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

1 भारतीय कपड़े विश्व भर में क्यों प्रसिद्ध थे?
उत्तर-बंगाल पर अंग्रेजों की विजय से पहले 1750 के आस-पास भारत पूरी दुनियाँ में कपड़ा उत्पादन के क्षेत्र में अन्य देशों से काफी आगे निकल चुका था। भारतीय कपड़े लंबे समय से
अपनी गुणवत्ता और बारीक कारीगरी के लिए दुनियाँ भर में मशहूर थे।

दक्षिण, पूर्वी, पश्चिमी एवं मध्य एशिया में इन कपड़ों की भारी माँग थी। 16 वीं शताब्दी से यूरोप की व्यापारिक कंपनियाँ अपने देश में बेचने के लिए भारतीय कपड़े खरीदने लगी थी। यूरोप के व्यापारियों ने भारत से आया बारीक सूती कपड़ा सबसे पहले मौजूदा ईराक के मोसूल शहर में अरब के व्यापारियों के पास देखा था।

इसी आधार पर वे बारीक बुनाई वाले सभी कपड़ों को ‘मस्लिन’ कहने लगे। जल्द ही यह शब्द प्रचलित हो गया। मसालों की तलाश में जब पुर्तगाली पहली बार भारत आए तो उन्होंने दक्षिण-पश्चिमी भारत में केरल के तट पर कालीकट में डेरा डाला।

यहाँ से वे मसालों के साथ-साथ सूती कपड़ा भी लेते गए। कालीकट से निकले शब्दों को ‘कैलिको कहने लगे। बाद में हर तरह के सूती कपड़े को ‘कैलिको ही कहा जाने लगा। ऐसे बहुत सारे शब्द हैं जो विदेशी बाजारों में भारतीय कपड़ों की लोकप्रियता की कहानी कहते हैं।

2 औद्योगिक क्रांति का भारतीय कुटीर उद्योग पर कैसा प्रभाव पड़ा था ?
उत्तर-औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप ब्रिटेन में सूती कपड़ा उद्योग के विकास से भारतीय कपड़ा उत्पादन पर कई तरह के असर पड़े। पहला अब भारतीय कपड़े को यूरोप और अमेरिका के बाजारों में ब्रिटिश उद्योगों में बने कपड़ों से मुकाबला करना पड़ता था।

दूसरा भारत से इंग्लैंड को कपड़े का निर्यात मुश्किल होता जा रहा था क्योंकि ब्रिटिश सरकार ने भारत से आने वाले कपड़ों पर भारी मात्रा में सीमा शुल्क लगा दिए थे। परेशान बुनकरों ने मदद के लिए कई बार सरकार से गुहार लगाई।

लेकिन परेशानी अभी और भी बढ़ने वाली थी। 1830 के दशक तक भारतीय बाजार ब्रिटेन में बने सूती कपड़ों से पट गए। इसके पश्चात् 1880 के दशक तक स्थिति यह हो गई थी कि भारत के लोग जितने सूती कपड़ा पहनते थे उसमें से दो तिहाई ब्रिटेन का बना होता था। इससे न केवल बुनकरों बल्कि सूत कातने वालों की भी हालत खराब हो गई। जो लाखों ग्रामीण महिलाएँ सूत कातकर अपनी आजीविका चला रही थी, वे बेरोजगार हो गई।

3 टिस्को की स्थापना कैसे की गई थी? वर्णन करें।
उत्तर-जमशेदजी टाटा भारत में बड़ा लौह एवं इस्पात कारखाना लगाने के लिए अपनी संपति का बड़ा भाग खर्च करने को तैयार थे, लेकिन इसके लिए पहली शर्त यह थी कि उम्दा
लौह अयस्क भंडारों का पता लगा लिया जाय।

एक दिन, कई घंटों तक जंगल में खाक छानने के बाद वेल्ड और दोराबजी एक छोटे से गाँव में जा पहुंचे। वहाँ उन्होंने देखा कि कुछ स्त्री-पुरुष टोकरियों में भरकर लौह अयस्क ले जा रहें हैं। ये अगरिया समुदाय के लोग थे। जब उनसे पूछा गया कि वे अयस्क कहाँ से लाए है, तो उन्होंने दूर स्थित एक पहाड़ी की तरफ उँगली उठा दी।

वेल्ड और दोराबजी घने जंगलों से होते हुए काफी देर बाद उस पहाड़ी पर जा पहुंचे। पहाड़ी का अध्ययन करने के बाद वेल्ड ने बताया कि उन्हें जिस चीज की तलाश थी वह मिल चुकी है। रझारा पहाड़ियाँ दुनिया के सबसे बेहतरीन लौह अयस्क भंडारों में से एक थी।

लेकिन यहाँ एक परेशानी थी। यह सूखा इलाका था और कारखाना चलाने के लिए आसपास कहीं पानी नहीं था। लिहाजा कारखाना लगाने के लिए सही जगह के बारे में टाटा की तलाश जारी रही। अगरिया समुदाय के लोगों ने ही लौह-अयस्क एक और स्रोत तलाश करने में मदद की, जहाँ से बाद में भिलाई स्टील संयंत्र को अयस्क की आपूर्ति की गई।

कुछ साल बाद सुवर्णरेखा नदी के तट पर बहुत सारा जंगल साफ करके फैक्ट्री और एक औद्योगिक शहर बसाने के लिए जगह बनाई गई। इस शहर को जमशेदपुर का नाम दिया गया। इस स्थान पर लौह-अयस्क भंडारों के निकट ही पानी भी उपलब्ध था। यहाँ टिस्को (टाटा आयरन एण्ड स्टील कंपनी) की स्थापना हुई जिसमें 1912 से स्टील का उत्पादन होने लगा।

4 उन्नीसवीं सदी में भारतीय लौह प्रगलन उद्योग का पतन क्यों हुआ?
उत्तर-उन्नीसवीं सदी में भारतीय लौह प्रगलन उद्योग के पतन के निम्नांकित कारण थे-
(क) वन कानूनों में आये बदलावों से लौह प्रगलन उद्योग में लगे समुदायों के रोजगार में कमी आयी।
(ख) लोहा गलाने के लिए आरक्षित वनों से लकड़ी की कमी से कोयला प्राप्ति में हास आया।
(ग) अगरिया समुदाय को भट्ठी चलाने हेतु वन विभाग को राणा भारी कर चुकाना पड़ता था।
(घ) लौह एवं इस्पात उद्योग की स्थापना से आयातित लोहे का इस्तेमाल होने लगा।
(ङ) स्थानीय प्रगालकों द्वारा बनाये लोहे की मांग कम होने लगी।

5 Jac एवं विकास पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।
उत्तर- भारत में सूती कपड़ा मिल की स्थापना सर्वप्रथम 1854 में बम्बई में हुई। यह कताई मिल थी। कच्चे कपास के निर्यात के लिए बम्बई एक महत्त्वपूर्ण बन्दरगाह था। यहाँ कपास की
खेती के लिए काली मिट्टी की विशाल पट्टी उपलब्ध थी जिससे कपड़ा मिलों के लिए कच्चा माल आसानी से प्राप्त होने लगा।

1990 तक बम्बई में 84 कपड़ा मिलों की स्थापना हो चुकी थी। जिसमें पारसी और गुजराती व्यापारियों ने चीन के साथ व्यापार कर काफी धन अर्जित किया। इसी दौरान अहमदाबाद में भी कपड़ा मिलों की स्थापना हुई। जिस कारण मजदूरों, कास्तकारों, दस्तकारों और खेतीहर कामगारों की माँग मिलों में होने लगी।

प्रारम्भिक दौर में इन कपड़ा कारखानों को कुछ समस्याओं से भी जूझना पड़ा। ब्रिटेन से आयतित सूती कपड़ा जो सस्ते थे के साथ मुकाबला करना पड़ा। भारत में निर्मित कपड़े के व्यापार पर भी असर पड़ा। क्योंकि जिन देशों में निर्मित माल भेजा जाता था वहां की सरकारों ने आयातित वस्तुओं पर सीमा शुल्क लगा दिया जिससे वहाँ वस्तुओं के दाम में वृद्धि हो गयी।

लेकिन प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान भारतीय कपड़ों की मांग में वृद्धि हुई ताकि सैनिक जरूरतों को पूरा किया जा सके अतः उत्पादन में वृद्धि की मांग भी बढ़ी। इस प्रकार भारत में कपड़ा मिलों में उत्तरोत्तर वृद्धि हुई।jac.jharkhand