पाठ-3 सवैया कवित्त भावार्थ,कवि देव, हिंदी कक्षा 10 वीं | Ncert Solution

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सवैया कवित्त भावार्थ के पहले इस छंद में कवि देव भगवान कृष्ण की बाल रूप का चित्रण करते हुए उनके सौंदर्य का अच्छी तरह से व्याख्या किया है उनके बचपन से जुड़ी हर तरफ की हरकत को भी कवि इस कविता में बताएं हैंऔर सवैया कवित्त भावार्थ के माध्यम से कविता के दूसरे छंद में कवि देव बसंत ऋतु के मनोरम दृश्य को व्याख्या करते हुए उनका गुणगान किया है बसंत ऋतु में चारों तरफ की हरियाली तथा खूबसूरत नज़ारे को अच्छा से खूबसूरत तरीका से व्या करते हुए लोगों को बताया साथ में बसंत ऋतु की चांदनी रात का भी उन्होंने बखूबी चर्चा की है

सवैया कवित्त भावार्थ NCE RT Solution for Class 10th

(1.) उद्धृत काव्यांश का आशय (व्याख्या) भाग 1 

1. पाँयनि नूपुर मंजु बजैं,
कटि किंकिनि कै धुनि की मधुराई ।
साँवरे अंग लसै पट पीत,
हिये हुलसै बनमाल सुहाई।
माथे किरीट बड़े दृग चंचल,
मंद हँसी मुखचंद जुन्हाई।
जै जग-मंदिर-दीपक सुंदर,
श्रीब्रजदूलह ‘देव’ सहाई। 

उत्तर-सवैया कवित्त भावार्थ के इस छंद में कवि देव बताता है कि श्रीकृष्ण के पैरों में पाजेब हैं और वे मधुर ध्वनि में बज रहे हैं। उनकी कमर में तगड़ी बँधी है जिसकी धुन भी बड़ी मधुर है। श्रीकृष्ण के साँवले शरीर पर पीले वस्त्र शोभायमान हो रहे हैं। उनके गले में बनमाल शोभित हो रही है और श्रीकृष्ण के माथे पर मुकुट है, नेत्र बड़े और चंचल हैं।

श्रीकृष्ण के मुख रूपी चंद्र पर मुस्कराहट चाँदनी के समान बिखरी रहती है। इस संसार रूपी मंदिर में वे दीपक के समान सुंदर प्रतीत होते हैं। वे ब्रज के दूल्हा हैं और देव की सहायता करने वाले हैं।

(2.) उद्धृत काव्यांश का आशय (व्याख्या) भाग 2 

1.डार द्रुम पलना बिछौना नव पल्लव के,
सुमन झिंगूला सोहै तन छबि भारी दै।
पवन झूलावै, केकी-कीर बतरावैं ‘देव’,
कोकिल हलावै-हुलसावै कर तारी दै।।
परित पराग सों उतारो करै राई नोन,
कंजकली नायिका लतान सिर सारी दै।
मदन महीप जू को बालक बसंत ताहि,
प्रातहि जगावत गुलाब चटकारी दै।। 

उत्तर-सवैया कवित्त भावार्थ के माध्यम से दरबारी कवि देव बसंत ऋतु की कल्पना कामदेव के नव-शिशु के रूप में करते हैं। वे कहते हैं- पेड़ और उसकी डालें बसंत रूपी शिशु के लिए पलना हैं। वृक्षों के नए पत्ते उस पलने पर बिछा हुआ बिछौना हैं। फूलों से लदा हुआ झिंगूला उसके तन को बहत अधिक शोभा दे रहा है। स्वयं वायु आकर उसका पलना झुला रही है। मोर और तोता मधुर स्वर में उससे बातें करके हाल बाँट रहे हैं।

कोयल आ-आकर उसे हिलाती है तथा तालियाँ बजा-बजाकर प्रसन्न करती है। कुंज के फूलों से लदी लताएँ मानो सुसज्जित साड़ी है, जिसे नायिका ने सिर तक ओढ़ा हुआ है। वह पराग के कणों को उड़ाकर मानो राई-नोन की रस्म पूरी कर रही है, ताकि बसंत रूपी शिशु को किसी की नजर न लगे। इस प्रकार बसंत मानो कामदेव जी का नन्हा बालक है, जिसे जगाने के लिए सवेरा हर रोज गुलाब चुटकी दिया करता है।

(2.) उद्धृत काव्यांश का आशय (व्याख्या) भाग 3 

2. फटिक सिलानि सौं सुधार्यो सुधा मंदिर,
उदधि दधि को सो अधिकाइ उमगे अमंद।
बाहर ते भीतर लौं भीति न दिखैए “देव’,
दूध को सो फेन फैल्यो आँगन फरसबंद।
तारा सी तरुनि तामें ठाढ़ी झिलमिली होति,
मोतिन की जोति मिल्यो मल्लिका को मकरंद ।
आरसी से अंबर में आभा सी उजारी लगै,
प्यारी राधिका को प्रतिबिंब सो लगत चंद ।।

उत्तर-कवि इस कविता सवैया कवित्त भावार्थ के जरिए चाँदनी रात में काल्पनिक मंदिर को स्फटिक शिला से बने मंदिर के रूप में देखता है। इस मंदिर को संगमरमर की शिलाओं को सुधारकर अमृत मंदिर के रूप में बनाया गया है। ऐसा प्रतीत होता है कि दही का समुद्र बहुत अधिक उमंग के साथ उमड़ता चला आ रहा है। इस मंदिर में बाहर से भीतर तक कहीं भी दीवार दिखाई नहीं दे रही है। इस मंदिर के आँगन में फर्श ऐसा लग रहा है।

मानो दूध का फेन (झाग) फैल गया हो। इस सफेद मंदिर में तारे के समान तरुणी (नायिका) खड़ी है, और झिलमिला रही है। इसमें मोतियों का प्रकाश (ज्योति) मल्लिका के फूलों के रस में मिलता प्रतीत होता है। सारा वातावरण सफद प्रसार होता है। आकाश शीशे के समान है। इस आइने में चंद्रमा राधा प्यारा का प्राता के समान प्रतीत होता है। उसकी आभा उजियारी लगती है।

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