परोपकार से बढ़कर कोई उत्तम कर्म नहीं

0

परोपकार निबंध परिचय

सेवा की भावना ही सही मायने में मनुष्य को असली ‘मनुष्य’ बनाती है । कभी किसी भूखे आदमी को खाना खिलाते समय उनके चेहरे पर व्याप्त सन्तुष्टि के भाव से जो आनन्द की प्राप्ति होती है, वह वर्णन करने लायक नहीं है ।

किसी मनुष्य सच में यदि अभाव से ग्रस्त है तो उनको नि:स्वार्थ भाव से उनकी अभाव को पूर्ति करने के बाद जो सन्तुष्टि प्राप्त होती है, वह बताने लायक नहीं है । परोपकार से मानव जीवन के व्यक्तित्व का विकास होता है ।इस लिए सभी को हमेशा परोपकार करते रहना चाहिए।आगे हम इसके विषय में विस्तार से पढ़ेंगे, तो चलिए शुरू करते है-

  • परोपकार का अर्थ,
  •  परोपकार से लाभ,
  •  परोपकार की शर्ते, 
  • निष्कर्ष। 

परोपकार की महत्ता बताते हुए कबीर ने कहा है-

वृक्ष कबहुँ नहिं फल भखै, नदी न संचै नीर ।परमारथ के कारने साधु न धरा सरीर।।

अर्थ

परोपकार अर्थात् दूसरों की निःस्वार्थ भलाई करना। इससे बढ़कर कोई दूसरा धर्म नहीं होता।
 पुराणों में महाभारतकार महाकवि व्यास ने दो ही मुख्य बातें कही है- सेवा से पुण्य होता है और परपीड़न से पाप। सचमुच दूसरों की निःस्वार्थ भलाई से बढ़कर मनुष्य-जीवन की कोई और सार्थकता नहीं है।

केवल अपने लिए तो नालियों के कीड़े मकोड़े भी जी लेते हैं किंतु मनुष्य तो वह है जो सभी जीवों के लिए जीता और मरता है।परोपकार मानव जीवन का धर्म है। परोपकार को नैतिक गुण कहा गया है। अतः इसमें छल-कपट और स्वार्थ-साधना की लिप्सा नहीं रहती। 

लाभ

सेवा कोई भी व्यक्ति निस्वार्थ भाव से करता है, परन्तु इसके बदले में वो संपत्ति प्राप्त हो जाती है जो लाखों रुपए देकर भी नहीं खरीदी जा सकती वह संपत्ति है मन का सुख । परोपकार मनुष्य में उच्च भावनाओं का विकास करता है। इससे मनुष्य का मानसिक उत्थान होता है।

परोपकारी तुच्छ स्वार्थ एवं छल-प्रपंच से ऊपर उठकर ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ के आदर्श को अपने जीवन में अपनाता है तथा लोगों का प्रिय पात्र बनता है। मानव जीवन की सार्थकता परोपकार में ही है। यही मनुष्य में ईश्वरीय गुणों का विकास करता है और समाज में “सत्यं शिवं सुन्दरम्” की भावना का प्रसार करता है, तुलसी ने भी कहा है “परहित सरिस धरमु नहिं भाई। 

परोपकार की शर्ते

सेवा करने के पहले आवश्यक है कि परोपकारी का जीवन प्रेम से भरा हुआ हो। जो स्वयं समृद्ध होगा, वही कुछ दे सकेगा। दूसरे, जिसका हमें उपकार करना है, उसके प्रति आत्मीयता होनी चाहिए। पराया मानकर किया गया उपकार दंभ को जन्म देता है।परोपकार ही एक ऐसा गुण है जो मानव को पशु से अलग कर देवत्व की श्रेणी में ला खड़ा करता है ।

निष्कर्ष

अगर सही अर्थों में मनुष्य बनना है, क्षुद्र स्वार्थों का परित्याग कर मानवीय गुणों से अपने को पूर्ण करना है तो व्यक्ति को परोपकार की भावना अवश्य ही अपनानी होगी। ncert solution

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here