परिश्रम का महत्व पर निबंध।NCRT solution Class 10th

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परिश्रम का महत्व क्लास 10 वीं निबंध परिचय

परिश्रम का महत्त्व को यदि जानना और समझना है, तो कुछ महान व्यक्तियों के जीवन सफर के बारे अध्ययन करे के बाद सही मायने में परिश्रम का महत्त्व के बारे पत्ता चलता है इस निबंध के अंतर्गत जितने भी टॉपिक पर की जाएगी वह नीचे अंकित हैसफलता प्राप्ति के लिए तीन महत्वपूर्ण रहस्य है – कोशिश ,साहस और योग्यता का होना बहुत जरुरी है

  • प्रस्तावना,
  • भाग्यवाद,
  • प्रकृति परिश्रम का पाठ पढाती है,
  • शारीरिक श्रम और मानसिक श्रम,
  • भाग्य और पुरूषार्थ,
  • उपसंहार।

प्रस्तावना- 

एक सफलता अनेक असफलताओं को छिपा देती है, इस लिए मनुष्य को परिश्रम का महत्त्व को समझना चाहिए। जीवन के उत्थान में परिश्रम का महत्त्वपूर्ण स्थान है। जीवन में आगे बढ़ने के लिए, ऊँचा उठने के लिए सुयश प्राप्त करने के लिए श्रम ही आधार है। श्रम से कठिन कार्य सम्पन्न किए जा सकते हैं।

जो श्रम करता है. उसका भाग्य भी उसका साथ देता है। जो सोता रहता है, उसका भाग्य भी सोता रहता है। श्रम के बल पर उत्तंग, अगम्य पर्वत-चोटियों पर अपनी विजय का ध्वज फहरा दिया। श्रम के बल पर मनुष्य चन्द्रमा पर पहुँच गया। श्रम के आधार से ही मानव समुद्र को लाँघ गया तथा उसने खाइयों को पाट दिया। कोयले की खदानों से बहुमूल्य हीरे खोज निकाले । मानव सभ्यता और उन्नति का एकमात्र आधार श्रम ही है।

श्रम के सोपानों का अवलम्ब लेकर मनुष्य अपनी मंजिल पर पहुंच जाता है। अतः परिश्रम ही मानव जीवन का सच्चा सौंदर्य है, क्योंकि परिश्रम के द्वारा ही मनुष्य अपने को पूर्ण बना सकता है। परिश्रम ही उसके जीवन में उत्कर्ष और महानता लाने वाला है। वास्तव में परिश्रम ही ईश्वर की सच्ची उपासना है। 

भाग्यवाद-

जिन लोगों ने परिश्रम का महत्त्व नहीं समझा, वे अभाव, गरीबी और दरिद्रता का दुःख भोगते रहे। जो लोग मात्र भाग्य को ही विकास का सहारा मानते हैं, वे भ्रम में हैं। मेहनत से जी चुराने वाले दास मलूका के स्वर में स्वर मिलाकर भाग्य की दुहाई के गीत गा सकते हैं, लेकिन वे नहीं सोचते कि जो चलता है, वही आगे बढ़ता है और मंजिल को प्राप्त करता है।

अर्थात् परिश्रम से सब कार्य सफल होते हैं, केवल कल्पना के महल बनाने से व्यक्ति अपने मनोरथ को पूर्ण नहीं कर सकता। शक्ति और स्फूर्ति से सम्पन्न सिंह गुफा में सोया हुआ शिकार प्राप्ति के ख्याली पुलाव पकाता रहे तो उसके उदर की अग्नि कभी भी शान्त नहीं हो सकती। सोया पुरुषार्थ फलता नहीं है। अर्थात् संसार में सुख के सकल पदार्थ होते हुए भी कर्महीन लोग उसका उपभोग नहीं कर पाते। जो कर्म करता है, फल उसे ही प्राप्त होता है और जीवन उसी का जगमगाता है। उसके जीवन उद्यान में ही रंग-बिरंगे सफलता के सुमन खिलते हैं व मुस्कराते हैं। परिश्रम से जी चुराना, आलस्य और प्रमोद में जीवन बिताना, इसके समान कोई बड़ा पाप नहीं है। गांधी जी का कहना है कि जो अपने हिस्से का काम किए बिना ही भोजन पाते हैं, वे चोर हैं।

परिश्रम का महत्त्व के बारे में पाठ पढ़ाती है- 

प्रकृति के प्रांगण में झाँककर देखें तो रात-दिन अथक परिश्रम करती हुई नजर आती हैं। पक्षी दाने की अन्नत आकाश में उड़ते दिखाई देते हैं। हिरन आहार की खोज में सावन में कुलाचे भरते रहते है। समस्त सृष्टि में श्रम का चक्र चलता रहता है। लोग श्रम को त्यागकर आलस्य का आश्रय लेते हैं, वे अपने जीवन में असफल होते हैं। भाग्य पर केवल आलसी व्यक्ति ही आश्रित होता है।  शारीरिक श्रम और मानसिक श्रम-परिश्रम चाहे शारीरिक हो अथवा मानसिक दोनों ही श्रेष्ठ हैं। सत्य तो वह है कि मानसिक श्रम की अपेक्षा शारीरिक श्रम कहीं श्रेयस्कर है। गांधी जी की मान्यता है कि स्वस्थ, सुखी और समुन्नत जीवन नए शरीरिक श्रम अनिवार्य है। शारीरिक श्रम प्रकृति का नियम है और इसकी अवहेलना निश्चय ही हमारे जीवन के लिए बहुत ही दुखदायी सिद्ध होगी।

भाग्य और पुरूषार्थ-

 भाग्य और पुरूषार्थ जीवन के दो पहिये हैं। भाग्यवादी बनकर हाथ पर हाथ रखकर बैठना मौत की निशानी है। परिश्रम के बल पर जो मनुष्य अपने बिगड़े भाग्य को बदल सकता है। परिश्रम ने महा मरूस्थलों को हरे-भरे उद्यानों में बदल दिया। मुरझाए जीवन में यौवन का वसन्त खिला दिया। 

उपसंहार-

 जो परिश्रम का महत्त्व को समझ गया वह परिश्रमी व्यक्ति राष्ट्र की बहुमूल्य पूँजी है। श्रम वह महान् गुण है, जिससे व्यक्ति का विकास और राष्ट्र की उन्नति होती है। संसार में महान बनने और अमर होने के लिए परिश्रमशीलता अनिवार्य है। श्रम से अपार आनन्द मिलता है। हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने हमें श्रम की पूजा का पाठ पढ़ाया। उन्होंने कहा- श्रम से स्वावलम्बी बनने का सौभाग्य मिलता है। हम अपने देश को श्रम और स्वावलम्बन से ही ऊँचा उठा सकते हैं। उन्होंने शिक्षा में श्रम के महत्त्व को समझाया। यदि आजादी की रक्षा करनी है तो प्रत्येक भारतवासी को परिश्रमी और स्वावलम्बी बनना होगा।

 

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