नर हो या नारी न निराश करो मन को निबंध | हिंदी व्याकरण

नर हो या नारी न निराश करो मन को निबंध | हिंदी व्याकरण के इस निबंध में नर हो, या नारी न निराश करो मन को, इसके माध्यम से मनुष्य जीवन में कभी न कभी कुछ न कुछ समस्याएं एवं परेशनियां उतपन होते रहती है , इसके बारे में संछिप्त जानकारी नीचे दर्शया गया है

नर हो या नारी न निराश करो मन को निबंध | हिंदी व्याकरण

  • प्रस्तावना,
  • नर से वास्तविक तात्पर्य,
  • नर की श्रेष्ठता का कारण,
  • आपदाताओ से संघर्ष द्वारा निराश से छुटकारा,
  • उपसंहार।

प्रस्तावना-

 संसार में छोटे-बड़े अनेक प्राणी रहते हैं। उनकी गणना करना तो नितांत असंभव है। फिर भी भारतीय परंपरा में माना जाता है कि 84 लाख योनियाँ भोगने के बाद, अच्छे कर्म करने पर, कहीं जाकर मनुष्य का जन्म मिला करता है।

इस मान्यता से लगता है कि संसार में जन्म लेनेवाले प्राणियों की संख्या कम से कम 84 लाख तो है ही। इस प्रकार मनुष्य को सृष्टि का सबसे श्रेष्ठ प्राणी कहा गया है। श्रेष्ठ प्राणी होकर भी यदि किसी कारणवश मनुष्य उदास या निराश हो जाता है। तो इसे उचित और अच्छी बात नहीं माना जा सकता। 

नर से वास्तविक तात्पर्य-

नर और नारी के इस निबंध में  ‘नर’ शब्द एक जातिवाचक (पुल्लिंग) संज्ञा है। इसका मुख्य अर्थ तो ‘मनुष्य’ ही लिया जाता है। ऐसा मान कर ही हम कवि के कथन की गहराई तक पहुँच सकते हैं। कवि मनुष्य से कहना चाहता है- भई, आप मनुष्य हो। इस कारण वीर, साहसी, बुद्धिमान और कर्मशील भी हो। ठीक है, अपना कर्म करने पर भी इस बार तुम्हें सफलता नहीं मिल सकी।

साहस करके भी मनचाहा फल नहीं पा सके। वीरता और बुद्धिमानी से काम लेकर भी जो चाहते थे, वह नहीं कर पाए। फिर भी इसमें निराश होने का कोई बात नहीं है? यदि मनचाहा नहीं हो सका, तो निराश और उदास होकर बैठ जाने से काम नहीं बनने वाला है। निराशा और उदासी त्याग कर ही कुछ कर पाना संभव है। 

नर की श्रेष्ठता का कारण-

 याद रखो कि तुम नर अर्थात् मनुष्य हो। मनुष्य सृष्टि का सबसे श्रेष्ठ प्राणी है। इस श्रेष्ठता का कारण है कि मनुष्य के पास सोचने-विचारने के लिए बुद्धि होती है। भावना, कल्पना और दृढ़ता के लिए मन होता है। सुख-दुःख क्षणिक भावों से ऊपर और आनंद में लीन रहनेवाली जागृत आत्मा रहती है।

चलने और दौड़ कर आगे बढ़ने के लिए दो शक्तिशाली पैर होते हैं कार्य करने के लिए दो मजबूत हाथ होते हैं। फिर वह इन सब का उचित ढंग से प्रयोग करना भी जानता है। इन्हीं सब विशेषताओं के कारण ही मनुष्य को सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ प्राणी कहा गया है। 


नर और नारी का आपदाताओं से संघर्ष द्वारा निराश से छुटकारा- 

मनुष्य जीवन के साथ तरह-तरह से सुख-दुःख जुड़े होते हैं व हार-जीत लगी रहती है। बीमारियाँ महामारियाँ आकर भी उसे पीड़ित तथा परेशान करती रहती हैं। प्रकृति के अनेक प्रकोप भी मनुष्य को सहते रहने पड़ते हैं, परंतु इन सबसे निराश होकर बैठ जाना और कर्तव्यों का पालन या कर्म करना त्याग देना कदापि ठीक नहीं है।

हिम्मत हार कर, निराश होकर बैठ जाना नरता या मनुष्यता नहीं है, बल्कि इन समस्त आपदाओं से लड़ने या संघर्ष करने में मनुष्यता है। इसी भावना द्वारा जाग कर ही आज तक संसार में बड़े एवं महान कार्य हुए हैं।

आज तक मनुष्यता है। इसी भावना द्वारा जाग कर ही आज तक संसार में बड़े एवं महान कार्य हुए हैं। यदि किसी कारणवश तुम सफलता नहीं पा सके, तो चिंता की कोई बात नहीं। अभी भी निराशा छोड़ कर कर्म-पथ पर डट जाओ। तुम्हें सफलता अवश्य मिलेगी। 

नर और नारी का उपसंहार- 

मनुष्य के लिए इस संसार में कुछ भी असंभव नहीं है। उसने अपनी बुद्धि और कर्मों से सब कुछ संभव करके दिखाया है। राष्ट्र निर्माण की इस नव-जागरण बेला में तुम्हें भी निराश होकर अपना समय, यौवन और जीवन नष्ट नहीं करना चाहिए। निराशा छोड़ कर, निरंतर परिश्रम करके उसे सार्थक करना है। मनुष्यता के माथे पर निराशा का कलंक नहीं लगने देना चाहिए। ऐसा सोचना तथा ऐसा करना ही नरता है।

नर हो न निराश करो मन को का क्या अर्थ है?

नर हो न निराश करो मन को कुछ काम करो कुछ काम करो जग में रहके निज नाम करो यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो कुछ तो उपयुक्त करो तन को नर हो न निराश करो मन को ।

नर को क्यों निराश नहीं होना चाहिए?

संसार में मनुष्य ही सबसे समर्थ प्राणी है, और सब कुछ पाने की क्षमता रखता है। यदि वह किसी कारणवश निराशा में डूब जाता है, तब उसके सोचने-समझने की शक्ति भी धीमी पड़ जाती है। तो फिर हम क्यों निराशा के शिकार हो आलसी और निकम्मे बनकर अपने और समाज पर बोझ बने। ncrt solutions

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