मन के हारे हार है, मन के जीते जीत हिंदी व्याकरण

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मन के जीते जीत है, परिचय

मानव जीवन के चक्र अनेक प्रकार की विविधताओं , समस्याओं ,एवं परेशानियों से भरा रहता है जिसमें सुख- दु:खु, आशा-निराशा तथा जय-पराजय इस तरह केअनेक रूप समाहित होते हैं । वास्तविक रूप में मानव की हार और जीत उसके अपने मन पर आधारित होती है । यदि मन में जीत का योग हो तो उनकी अवश्य जीत होती है, परंतु मन में हारने का निश्चय किया है तो वह अवश्य ही हर जायेगा ।इस लिए कहते है मन के जीते जीत है

  • मन की शक्ति,
  • दृढ़ संकल्प,
  • संघर्ष की क्षमता,
  • सत्य और न्याय का आदर्श आवश्यक,
  • विजय के लिए धैर्य की आवश्यकता। 

मन की शक्ति

 मन बहुत बलवान है। शरीर की सब क्रियाएँ मन पर ही निर्भर करती हैं। यदि मन में शक्ति, उत्साह और उमंग हो तो शरीर भी तेजी से कार्य करता है। अतः व्यक्ति की हार-जीत उसके मन की दुर्बलता-सबलता पर निर्भर है। 


दृढ़-संकल्प

मन के जीते जीत है,यदि मन में दृढ़ संकल्प हो, तो दुनिया का कोई संकट व्यक्ति को रोक नहीं सकता। एक कहावत है-
 ‘जाने वाले को किसने रोका है’ ?  अर्थात् जिसके मन में जाने का संकल्प हो तो कोई भी परिस्थिति उसे जाने से रोक नहीं सकती। विषम परिस्थितियों में से भी संकल्पवान व्यक्ति रास्ता निकाल लेता है। संघर्ष की क्षमता-किसी भी कार्य में सफलता प्राप्त करने के लिए व्यक्ति का दृढ़-संकल्प होना जरूरी है।

अब्राहम लिंकन भी अपने जीवन में कई बार असफल हुए थे और डिप्रेशन में भी गए, किन्तु उनके साहस और सहनशीलता के गुण होने के कारन उन्हें सर्वश्रेष्ठ सफलता मिलीं । अनेकों चुनाव हारने के बाद 52 वर्ष की उम्र में अमेरिका के राष्ट्रपती चुने गए।

गुलामी और आतंक के वातावरण में क्रांतिकारी किस प्रकार विद्रोह का बिगुल बजा लेते हैं? सूखी रोटियाँ खाकर और कठोर धरती का शय्या बनाकर भी देश को आजाद कराने का कार्य कैसे कर पाए महाराणा प्रताप? वह कौन-सा बल था, जिसके आधार पर मुट्ठीभर हड्डियों वाले महात्मा गांधी विश्व-विजयी अंग्रेजों को देश से बाहर कर सके। निश्चय ही यह थी-मन की सबलता।

सत्य और न्याय का आदर्श आवश्यक

मन के जीते जीत है, के इस छंद में मन की सबलता के लिए सत्य, न्याय और कल्याण के भाव का होना जरूरी है। जिसके मन में सत्य की शक्ति नहीं है, जो न्याय के पक्ष में नहीं है, उसके मन में तेज नहीं आ पाता। अनुचित कार्य करने व मन में एक छिपा हुआ विजय के लिए धैर्य की गुण, हैं जो व्यक्ति विनाश नदी में  बह जाते हैं, रोने-चिल जाते हैं। संकटों की उत्ताल पर चलते रहते हैं, वे ही विन कार्य करने वाला व्यक्ति का आधा मन यूँ ही हार बैठता है। उसके कछिपा हुआ चोर होता है, जो उसे कभी सफल नहीं होने देता। 


विजय के लिए धैर्य की आवश्यकता  

मन की स्थिरता, दृढ़ता और धैर्य ऐसे को व्यक्ति को विजय की ओर अग्रसर करते हैं। संकटों की बाढ़ में जाते हैं रोने-चिल्लाने लगते हैं, वे कायरों-सा जीवन जीते हुए नष्ट हो संकटों की उत्ताल तरंगों को सहर्ष झेलकर जो युवक कर्तव्य-मार्ग रहते हैं, वे ही विजयी होते हैं। कर्मठ युवक का धर्म तो कवि के शब्दों में ऐसा होना चाहिए-


जब नाव जल में छोड़ दी
तूफान ही में मोड़ दी
दे दी चुनौती सिंधु को
फिर धार क्या मँझधार क्या ? 

करने से पूर्व ही यदि व्यक्ति का मन स्थिर न हो तो फिर विजय प्राप्त हो नहीं सकती। बीमार और पराजित मन को हर बाधा अपना शिकार बनाती है। अतः यह बात पूरी तरह सच है कि जीत या हार मन की स्थिति पर निर्भर है। 

 

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