पाठ 8, कन्यादान, ऋतुराज

माँ ने बेटी को क्या-क्या सीख दी?

पाठ 8, कन्यादान, ऋतुराज, कवि परिचय

पाठ 8 कन्यादान ऋतुराज का जन्म सन् 10 फरवरी 1940 में राजस्थान के भरतपुर में हुआ। राजस्थान विश्वविद्यालय जयपुर से उन्होंने अंग्रेजी में परास्नातक की उपाधि प्राप्त की। सेवा में अवकाश ग्रहण करने के उपरांत अब वे जयपुर में रहते हैं।

ऋतुराज के प्रकाशित काव्य संग्रहों की संख्या 8 है-

  • कितना थोड़ा वक्त
  • पुल पर पानी,
  • अबेकस
  • मैं आंगिरस
  • आशा नाम नदी
  • नहीं प्रबोधचंद्रोदय
  • सुरत निरत
  • लीला मुखारविंद,
    एक मरणधर्मा और अन्य, तथा
  • सुरतनिरत उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं।

पाठ 8, कन्यादान, ऋतुराज
को मिलने वाले पुरस्कार
  • सोमदत्त परिमल सम्मान,
  • मीरा पुरस्कार,
  • पहल सम्मान तथा
  • बिहारी पुरस्कार भी मिल चुके हैं।

ऋतुराज की कविता मुख्यधारा से अलग समाज के हाशिए के लोगों की चिंताओ की कविता है। उनकी कविता दैनिक जीवन के अनुभवों के यथार्थ से जुड़ी हुई कविता है। उसके लिए शब्द वे अपने परिवेश और लोक जीवन से ढूंढते हैं।

पाठ 8, कन्यादान, परिचय

कन्यादान कविता में माँ बेटी को स्त्री के परंपरागत ‘आदर्श’ रूप से हटकर सीख दे रही है। कवि का मानना है कि समाज-व्यवस्था द्वारा स्त्रियों के लिए आचरण संबंधी जो प्रतिमा गढ़ लिए जाते हैं वे आदर्श के मुलम्मे में बंधन होते हैं। ‘कोमलता’ के गौरव में ‘कमजोरी’ का उपहास छिपा रहता है। लड़की जैसा न दिखाई देने में इसी आदर्शीकरण का प्रतिकार है। बेटी माँ के सबसे निकट और उसके सुख-दुख की साथी होती है। इसी कारण उसे अंतिम पूँजी कहा गया है। कविता में कोरी भावुकता नहीं बल्कि माँ के संचित अनुभवों की पीड़ा की प्रामाणिक अभिव्यक्ति है। इस छोटी-सी कविता में स्त्री जीवन के प्रति ऋतुराज जी की गहरी संवेदनशीलता अभिव्यक्त हुई है।

(1.) कितना प्रामाणिक था उसका दुख
लड़की को दान में देते वक्त
जैसे वही उसकी अंतिम पूँजी हो
लड़की अभी सयानी नहीं थी
अभी इतनी भोली सरल थी
कि उसे सुख का आभास तो होता था
लेकिन दुख बाँचना नहीं आता था
पाठिका थी वह धुंधले प्रकाश की
कुछ तुकों और कुछ लयबद्ध पंक्तियों की

प्रसंग-

प्रस्तुत पंक्तियां हमारी पाठ्यपुस्तक ‘क्षितिज’ के अंतर्गत संकलित कवि ऋतुराज की कविता ‘कन्यादान’ से ली गई हैं। इन पंक्तियों में कवि ने एक लड़की का कन्यादान करती माँ और लडकी की मनः स्थितियों और दशाओं का वर्णन किया है। कवि कहता है कि

पाठ 8, कन्यादान, ऋतुराज, व्याख्या, सार, आशय, भावार्थ

विवाह के दौरान अपनी लड़की के कन्यादान की रस्म को पूरा करती माँ का दुख अत्यंत चिर-परिचित और प्रामाणिक था। ऐसा लगता था जैसे कन्यादान में वह अपनी लड़की को नहीं बल्कि अपनी अंतिम संचित पूंजी को दान में दे रही हो। कवि कहता है कि लड़की अभी सयानी नहीं थी बल्कि भोली-भाली और सरल थी। उसे सुख तो ज्ञात थे लेकिन दुःखों से, जीवन में आने वाली परेशानियों और कष्टों से; वह परिचित नहीं थी। वह तो अभी जीवन के तारूण्य रूपी कोमल धुंधले प्रकाश का आमास कर सकती थी। टस कुछ तुक और छद अर्थात् जीवन के और सामाजिक बंधन तथा मान्यताओं के साल नियमों और अनुशासन का पता था।

(2.) माँ ने कहा पानी में झाँककर
अपने चेहरे पर मत रीझना
आग रोटियों सेंकने के लिए है
जलने के लिए नहीं
बरन और आभूषण शाब्दिक प्रमों की तरह
बंधन हैं स्त्री जीवन के
माँ ने कहा लड़की होना
पर लड़की जैसी दिखाई मत देना।

प्रसंग (पूर्ववत)-

प्रस्तुत पंक्तियां हमारी पाठ्यपुस्तक ‘क्षितिज’ के अंतर्गत संकलित कवि ऋतुराज की कविता ‘कन्यादान’ से ली गई हैं। इन पंक्तियों में कवि ने एक लड़की का कन्यादान करती माँ और लडकी की मनः स्थितियों और दशाओं का वर्णन किया है। कवि कहता है कि

पाठ 8, कन्यादान, ऋतुराज, व्याख्या

इसी प्रसंग का विस्तार करते हुए कवि बताता है कि उसकी माँ ने उसे सीख देते हुए कहा कि पानी में झांककर कभी अपने चेहरे पर न रीझना, अर्थात् अपने सौन्दर्य पर गर्व मत करना, उसे न समझना। बेटी। आग जलने के लिए नहीं है, वह रोटियाँ सेंकने के काम आती है। बल और आभूषण स्त्री के जीवन के बंधन हैं, मां ने कहा कि बेटी तुम बेटी तो होना, लड़की ती ही ही पर लड़की की भांति दिखाई मत देना। कविता के इस अनुच्छेद के माधयम से मां लड़की को समाज से तथाकथित रूढ़िवादी आदर्शों में न बँधने, उनका प्रतिकार और उनसे संघर्ष करने की सीख देती हैं ।

पाठ 8, कन्यादान, ऋतुराज, प्रश्न-अभ्यास

1.आपके विचार से माँ ने ऐसा क्यों कहा कि लड़की होना पर लड़की जैसी मत दिखाई देना?

उत्तर- लड़की होना पर लड़की जैसी न दिखाई देना ऐसा कहने के पीछे मां का आशय यह है कि समाज में प्रचलित वे मान्यताएं जो स्त्री का आदर्श के ढांचे में ढालकर रख देती हैं उन्हें सिर झुकाकर स्वीकार न कर लेना। उन रूढ़ियों के विरुद्ध संघर्ष की सीख माँ इस कथन के माधयम से दे रही हैं ।



2.’आग रोटियों सेंकने के लिए है जलने के लिए नहीं

(क) इन पंक्तियों में समाज में स्त्री की किस स्थिति की ओर संकेत किया गया है?

(ख) माँ ने बेटी को सचेत करना क्यों ज़रूरी समझा?

उत्तर-(क) समाज में स्त्री होने वाले अत्याचार (जला देना आदि) की ओर इसमें संकेत है।

(ख) मां ने बेटी को सामाजिक स्थिति के प्रति सकारात्मक और नकारात्मक सोच विकसित करने के लिए बेटी को सचेत करना जरूरी समझा।

3. ‘पाठिका थी वह धुंघले प्रकाश की
कुछ तुकों और कुछ लयबद्ध पंक्तियों की’

इन पंक्तियों को पढ़कर लड़की की जो छवि आपके सामने उभरकर आ रही है उसे शब्दबद्ध
कीजिए।

उत्तर- लड़की भोली-भाली और कम उम्र की थी। वह अभी जीवन के तारूण्य में प्रवेश करने वाली युवती थी। उसका व्यक्तित्व बहुत परिपक्व और प्रगल्भ नहीं था।

4. माँ को अपनी बेटी ‘अंतिम पूंजी’ क्यों लग रही थी?

उत्तर- बेटी माँ के सबसे अधिाक निकट और आत्मीय होती है। इसलिए कन्यादान के समय मां को ऐसा लग रहा था, जैसे वह अपनी संचित पूंजी को दान कर रही हो।

5. माँ ने बेटी को क्या-क्या सीख दी?

उत्तर- मां ने बेटी को सीख देते हुए कहा दर्पण में अपने सौंदर्य को दोकर कभी मत रीझना, आग जलने के लिए नहीं अपितु रोटियाँ सेकने के लिए है। बेटी तुम लड़की तो होना पर लड़की जैसी दिखाई मत पड़ना।

रचना और अभिव्यक्ति

6. आपकी दृष्टि में कन्या के साथ दान की बात करना कहाँ तक उचित है?

उत्तर- हमारी दृष्टि में केवल कन्यादान ही उचित है, दहेज-दान नहीं।

पाठेतर सक्रियता

‘स्त्री को सौंदर्य का प्रतिमान बना दिया जाना ही उसका बंधन बन जाता है’-इस विषय पर कक्षा
में चर्चा कीजिए। यहाँ अफगानी कवयित्री मीना किश्वर कमाल की कविता की कुछ पंक्तियाँ दी जा रही हैं। क्या आपको कन्यादान कविता से इसका कोई संबंध दिखाई देता है?

Share

About gyanmanchrb

इस वेबसाइट के माध्यम से क्लास पांचवीं से बारहवीं तक के सभी विषयों का सरल भाषा में ब्याख्या ,सभी क्लास के प्रत्येक विषय का सरल भाषा में सभी प्रश्नों का उत्तर दर्शाया गया है

View all posts by gyanmanchrb →

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *