यूरोप में समाजवाद एवं रूसी क्रांति पाठ 2 दीर्घ उत्तरीय प्रश्न | Ncert Solution For Class 9th

0

यूरोप में समाजवाद एवं रूसी क्रांति पाठ 2 दीर्घ उत्तरीय प्रश्न | Ncert Solution For Class 9th के इस ब्लॉग पोस्ट पर आप सभी विद्यार्थियों का स्वागत है, आप सभी विद्यार्थियों को पोस्ट के सभी महत्वपूर्ण लघु उत्तरीय प्रश्न के उत्तर पूरी के बारे में पूरी जानकारी मिलने वाली है तो चलिए शुरू करते है-

यूरोप में समाजवाद एवं रूसी क्रांति Ncert Solution For Class 9th

यूरोप में समाजवाद एवं रूसी क्रांति पाठ 2 दीर्घ उत्तरीय प्रश्न के उत्तर
यूरोप में समाजवाद एवं रूसी क्रांति पाठ 2 लघु उत्तरीय प्रश्न के उत्तर
यूरोप में समाजवाद एवं रूसी क्रांति पाठ 2 अति लघु उत्तरीय प्रश्न के उत्तर
1 रूस के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक हालात 1905 से पहले कैसे थे?
उत्तर-1905 ई० से पहले रूस की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक दशा बड़ी शोचनीय थी इसलिए वहाँ 1905 ई० में एक महान क्रांति हुई जो 1905 की रूसी क्रांति के नाम से प्रसिद्ध है।
रूस में जार का शासन न केवल अव्यवस्थित ही था वरन् अत्याचारी भी था। जार निकोलस द्वितीय (1894-1917) एक ढोंगी संत रासपुटिन के प्रभाव में आकर प्रतिक्रियावादी हो गया था और लोगों पर अत्याचार करने लगा था ।
किसानों और मजदूरों की स्थिति दिन-प्रतिदिन शोचनीय होती जा रही थी। चारों और अकाल ने अपना दामन फैला रखा था और भूख के कारण बहुत से लोग कीड़े-मकोड़ों की तरह मर रहे थे। स्थिति बड़ी उत्तेजक थी।
उधर पश्चिमी देशों की प्रजातंत्रीय प्रथाओं से प्रभावित होकर रूस के नागरिक भी अपने देश के उत्तरदायी सरकार चाहते थे परन्तु निरंकुशता के नशे में मदमस्त जार लोग की उचित मांगों को भी सुनने को कहाँ तैयार था? परिणाम यह हुआ कि देखते ही देखते जो शांतिप्रिय नेता थे वे भी क्रांतिकारी बन गये।
रूस में औद्योगिक क्रांति के आगमन से वहाँ मजदूरों की अनेक संस्थाएँ अस्तित्व में आयीं। क्योंकि रूस में मजदूरों और कारीगरों की अवस्था पहले ही बड़ी दयनीय थी इसलिए विभिन्न मजदूर संस्थाएँ मार्क्स की सामाजवादी विचारधारा की ओर आकर्षित हुई।
परिणामस्वरूप 1883 ई० में मजदूरों ने रशियन सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी की स्थापना की। 1903 ई० में यह दल दो भागों में विभक्त हो गया। एक को मेन्शेविक गुट और दूसरे को बोल्शेविक गुट का नाम दिया गया।
मेन्शेविक दल जो अल्पसंख्यक गुट था, फ्राँस और जर्मनी की भाँति ऐसा दल चाहता था जो शांतिमय ढंग से परिवर्तन लाये और चुनावों में भाग लेकर संसदीय प्रणाली द्वारा कार्य करें। इसके विपरीत दूसरा गुट बोल्शेविक गुट था जो बहुमत में था।
उस दल के नेता इस विचार के थे कि जिस देश में न कोई संसद रही हो और न ही नागरिकों के पास जनतांत्रिक अधिकार रहे हों वहाँ संसदीय प्रणाली द्वारा परिवर्तन लाना असम्भव है।
परिवर्तन तो प्राति द्वारा ही लाये जा सकते है, इसलिए इस दल के नेता संगठित होकर कांति के लिए काम करने में विश्वास रखते थे ।
शीघ्र ही लेनिन इस दल का नेता बन गया जो मार्क्स के बाद समाजवादी आदोलन का महानत्तम विचारक माना जाता है। 1905 ई० में जब जापान जैसे छोटे से देश ने रूस को युद्ध-क्षेत्र में पराजित कर दिया तो जनवरी 1905 ई० को रूस में एक क्रांति उठ खड़ी हुई।
इसमें मजदूरों के प्रतिनिधियों की परिषदों में जिन्हें साधारणतया सोवियत कहा जाता है, महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। काई स्थानों पर सेना और नौ-सेना ने क्रांतिकारियों का साथ दिया। इस क्रांति से डरकर जार थोड़ा झुका और अनेक रियायतें देने के लिए तैयार हो गया।

यूरोप में समाजवाद एवं रूसी क्रांति Ncert Solution For Class 9th Notes

2 1917 से पहले रूस की कामकाजी आबादी यूरोप के बाकी देशों के मुकाबले किन-किन स्तरों पर भिन्न थी?
उत्तर-1917 से पहले रूस में कामकाजी जनसंख्या यूरोप के अन्य देशों से अनेक दृष्टियों से भिन्न थी-
(क) कृषकों की हीन दशा-रूस के किसानों की दशा अन्य यूरोपीय से भिन्न थी वे अपने खेतों को कई बार इकट्ठा करके अपने मीर (चक) में सामूहिक खेती कर लेते थे। प्रत्येक कम्यून को व्यक्तिगत आवश्यकता के अनुसार बौट भी लिया जाता था। सन् 1861 में सामन्तवादी प्रथा समाप्त होने पर भी किसानों की दशा में कोई सुधार नहीं हुआ।
उनकी दशा दयनीय ही बनी रही क्योंकि उनके छोटे-छोटे और अलग-अलग खेत थे, उनकी सिंचाई के साधन अच्छे नहीं थे, उनका खेती करने का ढंग पुराना था, वैज्ञानिक रीति से खेती नहीं करते थे, उनके पास अच्छे कृषि-यंत्र नहीं थे।
करों का उन पर भारी बोझ था। उन्हें दो समय का भोजन भी नहीं मिलता था, अतः किसानों की हीन दशा क्रांति का एक मुख्य कारण बनी।
(ख) अमिकों की हीन दशा- रूस में मध्यम वर्ग न होने के कारण औद्योगिक क्रांति काफी देर से हुई। उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में औद्योगिक क्रांति का प्रारम्भ हुआ।
इसके पश्चात् उसका बड़ी तेजी से विकास हुआ किन्तु निवेश के लिए पूंजी विदेशों से आई। विदेशी पूँजीपति अधिक लाभ कमाना चाहते थे।
उन्होंने मजदूरों की दशा पर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया पूँजीपति लोग मजदूरों को कम से कम वेतन देकर अधिक से अधिक काम लेते थे तथा उनसे बुरा व्यवहार करते थे। उन्हें राजनैतिक अधिकार प्राप्त नहीं थे, अतः उनमें असन्तोष बढ़ता जा रहा था।
अतः हम कह सकते हैं कि मजदूरों की हीन दशा भी रूसी क्रांति में सहायक सिद्ध हुई। वस्तुतः रूस के उद्योग कुछ क्षेत्रों में स्थापित किए गए थे। रूस का प्रमुख औद्योगिक केन्द्र पीटर्सबर्ग और मास्को था। कारीगर अधिकांश उत्पादन स्वयं ले लेते थे।
लेकिन बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियाँ क्राफ्ट वर्कशाप के साथ-साथ चलती थीं। रूस में 1890 तक अन्य किसी भी प्रमुख यूरोपीय देश की तुलना में कुल मजदूरों की संख्या बहुत ही कम थी।
1900 तक अनेक क्षेत्रों में शिल्पकारों तथा औद्योगिक मजदूरों की संख्या लगभग बराबर हो गई थी। रूसी मजदूरों की दशा सुधारने के लिए विदेशी पूंजीपतियों ने कोई रुचि नहीं ली।
यूरोप में समाजवाद एवं रूसी क्रांति Question Answer
3 1917 में जार का शासन क्यों खत्म हो गया?
उत्तर-रूस में जारशाही का घराशायी होना-छोटी-छोटी घटनाएँ अक्सर ही क्रांति भड़का देती है। रूसी क्रांति की शुरुआत के लिए ऐसी ही एक छोटी घटना थी। रोटी खरीदने के प्रयास कर रही मजदूर औरतों का एक प्रदर्शन।
फिर मजदूरों की एक आम हड़ताल हुई जिसमें सैनिक और अन्य लोग भी शामिल हो गए। 12 मार्च 1917 को राजधानी सेंट पीटर्सवर्ग (बाद में इसका नाम पेत्रोग्राद पड़ा और फिर इसका लेनिनग्राद पड़ा।
सोवियत संघ के पतन के बाद पुनः इसका नाम सेंट पीसबर्ग हो गया है) क्रांतिकारियों के हाथों में आ गई। क्रांतिकारियों ने जल्द ही मास्को पर भी कब्जा कर लिया। जार शासन छोड़ कर भाग गया और 15 मार्च को पहली अस्थायी सरकारी बनी ।
जार के पतन की इस घटना को फरवरी की क्रांति कहा जाता है क्योंकि पुराने रूसी कैलेंडर के अनुसार यह 27 फरवरी 1917 को घटित हुई थी मगर जार
का पतन क्रांति का आरम्भ-मात्र था।
जनता की सबसे महत्वपूर्ण चार माँगें थीं- शान्ति, जमीन की मलकियत जोतने वाले को, कारखानों पर मजदूरों का नियंत्रण और गैर-रूसी जातियों को समानता का दर्जा ।
अस्थायी सरकार का प्रधान केरेस्की नामक एक व्यक्ति था। वह इनमें से किसी भी मांग को पूरा नहीं कर सका और सरकार जनता का समर्थन खो बैठी। लेनिन फरवरी की क्रांति के समय स्विटजरलैंड में निर्वासन का जीवन बिता रहे थे, वे अप्रैल में वापस लौट आए।
उनके नेतृत्व में बोल्शेविक पार्टी ने युद्ध समाप्त करने, किसानों की जमीन देने तथा सारे अधिकार सोवियतों को देने की स्पष्ट नीतियाँ सामने रखीं। गैर-रूसी जातियों के सवाल पर केवल बोल्शेविक पार्टी ही ऐसी थी जिसके पास एक स्पष्ट नीति थी
केरेंस्की सरकार की अलोकप्रियता के कारण 7 नवम्बर 1917 को उसका पतन उस समय हो गया जबकि उसके मुख्यालय विंटर पैलेस पर नाविकों के एक दल ने कब्जा कर लिया।
1905 की क्रांति में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले लियोन त्रात्सकी मई 1917 में रूस लौट आए थे। पेत्रोग्राद सोवियत के प्रमुख के रूप में नवम्बर के विदोह का वह एक प्रमुख नेता थे। उसी दिन सोवियतों की अखिल-रूसी कांग्रेस की बैठक हुई और उसने राजनीतिक सत्ता अपने हाथों में ले ली।
17 नवम्बर को होने वाली इस घटना को अक्टूबर की क्रांति कहा जाता है क्योंकि उस दिन पुराने रूसी कैलेंडर के अनुसार 25 अक्टूबर की तारीख थी। अक्टूबर की अति लगभग पूरी तरह शान्तिपूर्ण की।
कांति के दिन पेत्रोग्राद में दो व्यक्ति मारे गए। मगर यह नया राज्य जल्द ही गृह-युद्ध में फंस गया। समाभ्युत जार की सेना के कुछ अधिकारियों ने गोवियत राजसत्ता के खिलाफ सशस्त्र वियोह रोड दिया।
इसकप्रास, जापान, अमरीका और अन्य देशों की सेनाएँ भी उनको पक्ष में आ गई। यह युद्ध 1020 तक चला। इस समय तकनए राज्य की ‘लालसेना’ (रेड आर्मी) जार के पुराने साम्राज्य के लगभग सभी भागों पर अपना नियंत्रण स्थापित कर चुकी थी।
यह लाल सेना बुरी तरह साधनहीन थी और इसमें अधिकांशतः मजदूर और किसान थे फिर भी उसने अपने से बेहतर साधनों से लैस और बेहतर प्रशिक्षण प्राप्त सेनाओं पर विजय पाई। इस प्रकार जार का शासन खत्म हो गया।

यूरोप में समाजवाद एवं रूसी क्रांति का प्रश्न उत्तर क्लास 9th इतिहास

4 फरवरी क्रांति की प्रमुख घटनाओं और प्रभावों का वर्णन करें।
उत्तर-फरवरी क्रांति की प्रमुख घटनाएँ-
(क) फरवरी माह में रूसी मजदूरों ने खाद्यान्न अभाव को बुरी तरह महसूस किया गया।
(ख) नेवा नदी के दक्षिणी किनारे स्थित एक फैक्टरी में तालाबंदी 22 फरवरी 1917 को हुई।
(ग) 23 फरवरी, 1917 को नेवा नदी के फैक्टरी मजदूरों की सहानुभूति में पचास फैक्टरी के मजदूरों ने हड़ताल कर दी।
(घ) रविवार 25 फरवरी को सरकार ने ड्यूमा के सदस्यों को निष्कासित कर दिया। देश भर में लोगों ने जार के इस कार्य का घोर विरोध किया।
(ड) 26 फरवरी, 1917 को प्रदर्शनकारी और अधिक शक्ति से नेवा नदी के बायें किनारे की गलियों में प्रदर्शन करने हेतु निकल पड़े।
(च) 27 फरवरी, 1917 को हड़तालियों तथा प्रदर्शनकारियों ने पुलिस मुख्यालय में तोड़-फोड़ कर दी। गलियों लोगों से भर गईं। गलियों में लोग गला फाड़-फाड़ कर रोटी. मजदूरी, काम के घंटों एवं लोकतंत्र के पक्ष में नारे लगा रहे थे।
(छ) 28 फरवरी, 1917 को एक प्रतिनिधि मण्डल जार से मिलने गया। सेना के कमाण्डरों ने जार को सलाह दी कि वह गद्दी छोड़ दे। उसने उनकी सलाह को मान लिया।
(ज) 2 मार्च, 1917 को मिलिट्री कमाण्डरों ने अपने-अपने पदों से त्यागपत्र दे दिया। सोवियत नेताओं एवं ड्यूमा नेताओं ने देश को चलाने के लिए एक तदर्थ सरकार बनाई। फरवरी 1917 की क्रांति के प्रभाव-
(क) लेनिन ने रूस की नई सरकार के सामने निम्नांकित माँगें रखीं-
(i) युद्ध को बंद कर दिया जाए।
(ii) भूमि काश्तकारों के दे दी जाए।
(iii) बैंकों एवं अन्य वित्तीय संस्थाओं का राष्ट्रीयकरण कर दिया जाए।
उपर्युक्त उल्लेखित लेनिन के तीन मौंगों को लेनिन की अप्रैल थिसिस
कहा जाता है।
(ख) गर्मी के दिनों में मजदूरों का आंदोलन फैल गया। औद्योगिक क्षेत्रों में कमेटियों गठित की गई जो उद्योगपतियों से सवाल करने लगीं कि वे किस तरह से अपने-अपने कारखानों को चला रहे थे।
(ग) बड़ी संख्या में श्रम संगठनों का रूस में गठन हुआ।
(घ) सेना में सिपाहियों की कमेटियाँ गठित कर दी गई।
(ङ) जून 1917 में लगभग 500 सोवियतों ने अपने प्रतिनिधि सोवियतों की आल रसियन काँग्रेस में भेजे।
यूरोप में समाजवाद एवं रूसी क्रांति नोट्स
5 अक्टूबर क्रांति की प्रमुख घटनाओं और प्रभावों का वर्णन करें।
उत्तर-अक्टूबर क्रांति की प्रमुख घटनाएँ-
(क) अस्थायी सरकार एवं बोल्शेविकों में जैसे ही टकराव एवं संघर्ष बढ़ा, तो लेनिन को डर हो गया कि अस्थायी सरकार कहीं तानाशाही की स्थापना न कर दे।
(ख) सितम्बर 1917 में लेनिन ने सरकार के विरुद्ध विद्रोह करने के विषय में बातचीत करनी शुरू कर दी थी। सेना, सोवियतों एवं कारखानों में जो बोल्शेविकों के समर्थक थे उन्हें साथ-साथ लाया गया।
(ग) 16 अक्टूबर 1917 को लेनिन ने पेत्रोग्राद सोवियत तथा बोल्शेविक पार्टी को सहमत कर लिया कि समाजवादी शक्ति को हथिया लें। लेनिन के नेतृत्व में एक सैनिक क्रांतिकारी कमेटी को सोवियतों के द्वारा नियुक्त किया गया। घटना की तारीख को गुप्त रखा गया।
(घ) 24 अक्टूबर को विप्लव शुरू हो गया। समस्या की बू आते ही प्रधानमंत्री केरेन्स्की ने शहर छोड़ दिया और सेना को बुला लिया। प्रातः काल में ही अस्थायी सरकार के प्रति जो सेना वफादार थी उसने बोल्शेविक अखबारों की दो इमारतों पर कब्जा कर लिया।
सरकार समर्थक सेनाओं को टेलीफोन एवं टेलीग्राफ कार्यालयों पर नियंत्रण करने तथा विन्टर पैलेस की रक्षा के लिए भेज दिया गया।
(ङ) अन्य शहरों में भी विद्रोह हुए। विशेषकर मास्को में बड़ी भारी लड़ाई हुई लेकिन दिसम्बर तक बोल्शेविकों ने मास्को-पेत्रोग्राड क्षेत्र पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया।
अक्टूबर 1917 की क्रांति के प्रभाव-
(क) चूँकि बोल्शेविक निजी सम्पत्ति के बिल्कुल खिलाफ थे इसलिए नवम्बर 1917 तक सभी उद्योग एवं बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया। इसका अर्थ था इनका स्वामित्व एवं प्रबन्ध सरकार ने अपने हाथों में लिया।
(ख) भूमि को सामाजिक सम्पत्ति घोषित कर दिया गया और किसानों को अनुमति दे दी गयी कि वे कुलीनों की भूमि हथिया लें।
(घ) परिवार की जरूरतों के अनुसार बड़े घरानों की भूमि को छोड़कर बोल्शेविकों ने शेष को जबरदस्ती छीन लिया।
(ड) श्रम संघों को दल के नियंत्रण में रखा गया।
(च) नवम्बर 1917 में बोल्शेविकों ने संविधान सभा के लिए चुनाव कराये लेकिन वे बहुमत का समर्थन प्राप्त करने में विफल रहे।
(छ) मार्च 1918 में बोल्शेविकों ने अपने राजनीतिक विरोधियों के प्रबल विरोध के बावजूद बेस्ट लिटोक्क्सो में शान्ति-संधि कर ली।

यूरोप में समाजवाद एवं रूसी क्रांति कक्षा 9

6. बोल्शेविको ने अक्तूबर क्रांति के फौरन बाद कौन-कौन से प्रमुख परिवर्तन किए?
उत्तर-15 मार्च, 1917 को रूस में जार ने राज सिंहासन छोड़ दिया। केरेन्स्की की नेतृत्व में नई सरकार बनी, जो जनता की समस्याओं को हल करने में असफल रही।
अतः उसने जनता का समर्थन खो दिया। ऐसे समय में लेनिन के नेतृत्व में बोल्शेविक पार्टी ने सत्ता संभाली। इस पार्टी ने लेनिन के नेतृत्व में किसानों को भूमि हस्तांतरित करने और सारी सत्ता सोवियतों को देने के लिए स्पष्ट नीतियाँ अपनाई। लेनिन ने रूसी क्रांति को सफल बनाने के लिए अग्रलिखित
घोषणाएँ की-
(क) उसने सर्वप्रथम रूस को प्रथम महायुद्ध से अलग कर दिया। यद्यपि औपचारिक रूप से जर्मनी के साथ संधि बाद में ही की गई। इस शांति-संधि के वक्त जर्मनी ने शांति की कीमत के रूप में जो भू-भाग माँगे उसे साम्यवादी सरकार ने दे दिया।
(ख) जमींदारों, चर्च और जार भूमि किसानों की पंचायतों को सौंप दी।
(ग) सरकार ने निजी सम्पत्ति के अधिकार को समाप्त कर दिया।
(घ) उत्पादन के सभी साधनों पर सरकार का नियंत्रण हो गया।
(ङ) उद्योगों का नियंत्रण मजदूर सोवियतों और श्रमिक संघों को दे दिया गया।
(च) उद्योगों, बैंकों, कम्पनियों, खानों आदि का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया।
(छ) लोगों के अधिकार की उद्घोषणा की गई तथा गैर-रूसी जनता सहित जार के साम्राज्य के सभी नागरिकों को आत्म-निर्माण का अधिकार दे दिया गया।
(च) वोल्शेविकों द्वारा जुलाई 1917 में लोकप्रिय प्रदर्शन आयोजित किया गया तथा उसे सख्ती से कुचल दिया गया। अनेक बोल्शेविक नेता या तो छिप गये या रूस छोड़कर विदेशों को भाग गये।

इतिहास कक्षा 9 पाठ 2 notes in Hindi

7. जार निकोलस द्वितीय के निरंकुश शासन प्रकृति का वर्णन करें जिसने रूस को क्रांति के कगार पर ला दिया।
अथवा
जार निकोलस रूसी क्रांति के लिये किस हद तक जिम्मेदार थे, उसका वर्णन करें।
उत्तर-1917 ई० में रूस में एक क्रांति हुई जो इतिहास में अक्टूबर क्रांति के नाम से भी प्रसिद्ध है। यह क्रांति विशेषकर राजनीतिक कारणों का या रूस के जार निकोलस द्वितीय के निरंकुश शासन का परिणाम थी। रूस का जार, विशेषकर निकोलस द्वितीय बिल्कुल उद्दण्ड और निरंकुश शासक था।
1905 ई० की क्रांति दबाने के पश्चात् जार निकोलस द्वितीय की निरंकुशता बढ़ती ही गयी। उसने गुप्तचर विभाग का कार्य बहुत तेज कर दिया। जिनका क्रांति से जरा-सा भी संबंध समझा गया उनको या तो मार दिया गया या बंदी बना लिया गया या देश-निकाला दे दिया गया।
जार अपनी सुन्दर रानी जरीना के प्रभाव में था जबकि रानी जरीना पर रासपुटीन नामक ढोंगी सन्त का प्रभाव था। यह ढोंगी सन्त दमन की नीति का बड़ा पक्षपाती था। कहते हैं कि यह एक गुण्डा था जो कि चोरी के अपराध में पकड़ा गया था।
बाद में उसने साधु का वेष धारण कर लिया था। एक बार जब रानी और उसका इकलौता पुत्र बीमार पड़े तो उसने यह कहा कि वह अपनी चमत्कारिक शक्ति से उनको ठीक कर देगा। ठीक हो जाने पर रानी उसको बहुत मानने लगी।
इतिहासकार रासपुटीन को ‘होली डैविल’ के नाम से पुकारते हैं। 1905 ई० की क्रांति के कारण जार ने यह वायदा किया था कि वह रूस में ड्यूमा अर्थात पार्लियामेंट का निर्माण करेगा परन्तु बाद में निरंकुशता के कारण उसने केवल ढाई महीने में ही उसे भंग कर दिया। इसके अतिरिक्त जार ने एक विशाल साम्राज्य स्थापित कर रखा था जिसमें भाँति-भाँति के लोग रहते थे जो सदा उसके लिए कोई न कोई समस्या खड़ी किए रहते थे।
इसके अतिरिक्त जार की साम्राज्यवादी नीति भी देश के लिये बड़ी भयंकर सिद्ध हुई क्योंकि निरन्तर युद्धों के कारण इतना धन व्यर्थ में गया कि देश में एक प्रकार का आर्थिक संकट-सा आ गया और सारी जनता जार के विरुद्ध हो गयी।
इतिहास कक्षा 9 पाठ 2 Question answer
8. प्रथम विश्वयुद्ध में रूस के भाग लेने से उत्पन्न परिस्थितियाँ किस प्रकार रूसी तानाशाही में गिरावट का कारण बनीं?
अथवा. प्रथम विश्वयुद्ध ने 1917 ई० की रूस की क्रांति लाने में क्या प्रभाव डाला?
उत्तर-यूरोप में 1914 ई० से पहले दो शक्ति गुट स्थापित हो चुके थे। एक में इंग्लैंड फ्राँस और रूस तथा दूसरे में जर्मनी, ऑस्ट्रिया और इटली थे। प्रथम विश्वयुद्ध शुरू होने पर रूस बिना किसी पूर्व तैयारी के अपने गुट का साथ देने के लिये युद्ध में शामिल हो गया।
पहले ही देश में धन, अस्त्रों-शस्त्रों तथा सेना की कमी थी अतएव जबरदस्ती किसानों को भर्ती करके बड़ी संख्या में युद्ध के मैदान में भेज दिया गया। लड़ने के साधनों, अस्त्र-शस्त्रों तथा रसद की कमी से ये अनाड़ी युद्ध में बुरी तरह मारे गये। अनुमानतः छः लाख सैनिक मारे गये, पाँच लाख घायल हुए तथा बीस लाख कैदी बना लिये गये।
जो लोग मारे गये, घायल हुए या कैदी बने, उनके परिवारों एंव पड़ोसियों में सरकार के प्रति विद्रोह की प्रबल भावनाएँ पनपने लगीं। अब लोग ऐसी सरकार को कभी सहन नहीं कर सकते थे।
जब 7 मार्च, 1917 ई० को विद्रोह शुरू हुआ तो विद्रोहियों की संख्या निरन्तर बढ़ती चली
गई क्योंकि लोगों को पता चल चुका था कि जार के पास अब इतने सैनिक नहीं कि वह अपना निरंकुशवादी शासन बनाये रख सके।
यदि प्रथम विश्वयुद्ध में जार भाग न लेता और रूसी सेना उसमें नष्ट न हुई होती तो वह अपने सैनिक बल पर लोगों के विद्रोह को आसानी से कुचल डालता। इस प्रकार जार द्वारा प्रथम विश्वयुद्ध में भाग लेना उसके लिये बड़ी विनाशकारी सिद्ध हुआ।
यूरोप में समाजवाद एवं रूसी क्रांति Question Answer and Notes
9 उन घटनाओं का वर्णन करें जो 1905 की क्रांति के लिए उत्तरदायी थीं। इस क्रांति के दो महत्त्वपूर्ण प्रभावों का उल्लेख करें।
उत्तर-(क) 1904-1905 में रूस एवं जापान में युद्ध हुआ। युद्ध में रूस, जापान द्वारा पराजित कर दिया गया था। रूसी लोगों ने जार का जोरदार विरोध करना शुरू कर दिया।
उनका विश्वास था कि रूस की पराजय (जापान जैसे छोटे देश के हाथों) इसलिए हुई क्योंकि जार युद्ध को ठीक ढंग से जारी रखने में विफल रहा था।
(ख) रविवार, 9 जनवरी, 1905 के दिन हजारों मजदूर पूर्णतया शांतिपूर्वक अपनी पलियों तथा बच्चों के साथ जार के महल की ओर अपने क्रोध को प्रकट करने तथा उसे एक याचिका देने के लिए बढ़ रहे थे।
जब अमिक विन्टर पैलेस की ओर जार के पास जा रहे थे कि उन पर जार के
अंगरक्षकों एवं सेना ने गोली चला दी। एक हजार से अधिक लोग मारे गये तथा कई हजार लोग बुरी तरह घायल हो गये।
इस घटना के फलस्वरूप 1905 में क्रांति हुई। यद्यपि इस क्रांति को कुचल दिया गया था लेकिन खूनी रविवार की घटना के फलस्वरूप सम्पूर्ण रूस में अप्रत्याशित तोड़-फोड़ एवं उपद्रव हुए। यहाँ तक कि इस क्रांति में सेना तथा नौ सेना के कुछ दस्तों ने भी भाग लिया।
क्रांति का प्रभाव-
(क) जार ने इस क्रांति के बाद नागरिकों को कुछ अधिकार दे दिये। वे अब मजदूर संघ बना सकते थे तथा उन्हें भाषण देने की स्वतंत्रता दे दी गई। ड्यूमा का सत्र बुलाया गया।
(ख) 1905 की क्रांति के बाद रूस में एक नये ढंग का संगठन, जिसे सोवियत नाम से जाना गया, गठित हुआ। इसने फरवरी तथा अक्टूबर 1917 की दोनों क्रांतियों में बढ़-चढ़कर भाग लिया।
10 रूस की क्रांति के अंतर्राष्ट्रीय परिणामों की विवेचना करें।
अथवा. विश्व पर 1917 की रूसी क्रांति के क्या प्रभाव पड़े?
उत्तर-1917 की रूसी क्रांति के परिणाम-
(क) अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर समाजवादी आंदोलन- रूसी क्रांति का प्रभाव विश्वव्यापी था। ‘मनुष्यों तथा नागरिकों के अधिकारों की घोषणा’ में शामिल सिद्धांतों की तरह मार्क्स के विचारों को भी व्यापक पैमाने पर लागू करने की बातें कही गई। रूस ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मार्क्स के समाजवादी विचारों का प्रचार शुरू कर दिया, जिससे अन्य देशों में भी समाजवादी क्रांतियाँ हो सकी।
(ख) आर्थिक नियोजन- रूस में आर्थिक नियोजन प्रणाली बहुत सफल हुई जिससे विश्व के कई राष्ट्रों ने अपने विकास के लिए भी आर्थिक नियोजन प्रणाली को अपनाना शुरू किया।
(ग) श्रम की महत्ता बढ़ी- रूस में क्रांति के बाद हर व्यक्ति के लिए काम करना अनिवार्य कर दिया गया। इससे श्रम को विश्व में एक नयी मर्यादा मिली।
(घ) उपनिवेशों में स्वतंत्रता आंदोलन- नयी सोवियत सरकार की राष्ट्रीय संघर्ष कर रही औपनिवेशिक जनता का मित्र समझा जाने लगा। क्रांति के बाद रूस यूरोप का एकमात्र ऐसा देश था, जिसने विदेशी शासन से सभी राष्ट्रों की स्वाधीनता का खुलकर समर्थन किया। रूसी क्रांति के फलस्वरूप कई उपनिवेशों के लोगों ने साम्राज्यवाद विरोधी जन आंदोलन को तीव्र
कर दिया।
(ङ) सार्वभौमिकता तथा अंतर्राष्ट्रीयवाद- अनेक समस्याओं को जिसे अबतक राष्ट्रीय समस्याएँ मानी जाती थी, अब उन्हें पूरी दुनिया की चिंता का विषय समझी जाने लगी।
सार्वभौमिकता और अंतर्राष्ट्रीय, जो आरंभ से ही समाजवादी विचारधारा के मूल सिद्धांत रहे है, पूरी तरह साम्राज्यवाद के विरोधी थे। रूसी क्रांति ने स्वाधीनता के आंदोलनों को भी प्रभावित किया और इस प्रभाव के कारण इन आंदोलनों ने अपने लक्ष्यों को और व्यापक बनाकर उसमें योजनाबद्ध आर्थिक विकास द्वारा सामाजिकता और आर्थिक समानता लाने का सिद्धांत भी शामिल कर लिया।
इस तरह से रूसी क्रांति का विश्वव्यापी प्रभाव पड़ा। रूसी क्रांति के बारे में लिखते हुए स्वर्गीय पंडित जवाहरलाल नेहरू ने कहा है कि ‘इसने मुझेराजनीति के बारे में अधिक सामाजिक परिवर्तन की दृष्टि से सोचने के लिए बाध्य किया।
इतिहास कक्षा 9 पाठ 2 question answer in Hindi
11 1917 की रूसी क्रांति के मुख्य कारणों की विवेचना करें।
उत्तर-रूसी क्रांति के निम्नांकित कारण है-
(क) जार का निरंकुश शासन-जारों की रूसी राजसत्ता आधुनिक युग की आवश्यकताओं से एकदम मेल नहीं खाती थी। जार निकोलस द्वितीय स्वयं भी राजाओं के देवी अधिकारों में विश्वास करता था। निरंकुशतंत्र की रक्षा को वह अपना परम कर्तव्य मानता था।
(ख) किसानों की दयनीय स्थिति-1861 ई० में भू-दास प्रथा का उन्मूलन हो चुका था. मगर इससे किसानों की दशा नहीं सुधरी। उनकी जोतें अभी भी बहुत छोटी-छोटी थी और उनको विकसित करने तक का पूंजी भी किसानों के पास न थी। किसानों की जमीन की भूख रूसी समाज के असंतोष का एक महत्त्वपूर्ण सामाजिक तथ्य था।
(ग) मजदूरों की हीन दशा- रूस में औद्योगिकरण का आरंभ देर से हुआ। फिर भी इसकी गति अच्छी थी मगर निवेश के लिए आधी अधिक पूँजी विदेशों से आई।
विदेशी निवेशकों की दिलचस्पी आसानी से मुनाफा बटोरने में थी और मजदूरों की दशा सुधारने की उन्हें कोई चिंता नहीं थी। मजदूरों को कोई भी राजनीतिक अधिकार प्राप्त न थे। इनकी दशा बहुत ही हीन थी।
(घ) जार का रूसीकरण की नीति- यूरोप और एशिया की विभिन्न जातियों को पराजित करके रूसी जारों ने विशाल साम्राज्य खड़ा किया था। इन जीते हुए क्षेत्रों की जनता की संस्कृतियों का महत्त्व कम करने की कोशिश की। रूस के साम्राज्यवादी प्रसार उसे टकरावों में भी उलझाया और होनेवाले युद्धों ने रूसी राजसत्ता के खोखलेपन को और उजागर किया।
(ङ) समाजवादी विचारधारा का प्रचार- औद्योगीकरण के आरंभ के बाद जब मजदूरों के संगठन बने तो उन पर समाजवादी विचारधारों का प्रभाव था। 1883 ई० में मार्क्स के एक अनुयायी जूयार्जी प्लेखानोव ने रूसी सामाजिक लोकतांत्रिक पार्टी का गठन किया।
(च) प्रथम विश्वयुद्ध में रूस की हार-जार ने अपनी साम्राज्यवादी महत्त्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए रूस को प्रथम विश्वयुद्ध में झोंक दिया। यह घातक सिद्ध हुआ और रूसी निरंकुशतंत्र का अंत हो गया। रूसी सेना बुरी तरह हार रही थी। लाखों सैनिक मारे जा चुके थे। सैनिकों की दशा पर सरकार का कोई ध्यान नहीं था। इन्हीं कारणों से रूस में क्रांति होना अनिवार्य हो गया।jac ranchi

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here