यह दंतुरित मुसकान भावार्थ(नागार्जुन)|क्लास 10th हिंदी |पाठ 6

यह दंतुरित मुसकान पाठ  का भावार्थ या आशय क्लास 10th हिंदी

यह दंतुरित मुसकान पाठ  का भावार्थ या आशय क्लास 10th हिंदी Ncert Solution Hindi

यह दंतुरित मुसकान आशय (नागार्जुन) 

1. तुम्हारी यह दंतुरित मुसकान
मृतक में भी डाल देगी जान
धूलि-धूसर तुम्हारे ये गात….
छोड़कर तालाब मेरी झोंपड़ी में खिल रहे जलजात
परस पाकर तुम्हारा ही प्राण,
पिघलकर जल बन गया होगा कठिन पाषाण
छू गया तुमसे कि झरने लग पड़े शेफालिका के फूल
बाँस था कि बबूल ?

यह दंतुरित मुसकान आशय (नागार्जुन) स्पष्ट करते हुए कवि बच्चे को संबोधित करते हुए कहता है कि तुम्हारे अभी नए-नए दाँत आए हैं। इन छोटे-छोटे दाँतों से झलकती मुसकान इतनी मनमोहक है कि यह निर्जीव व्यक्ति के हृदय में भी जान डाल देती है। इस मुसकान को देखकर मृतक में भी प्राणों का संचार होने लगता है। तुम्हारा यह धूल-मिट्टी से सना शरीर कमल के समान शोभायमान हो रहा है। ऐसा प्रतीत होता है कि यह कमल का फूल सरोवर (तालाब) में नहीं, मेरी झोंपड़ी में खिला है।

ऐसा प्रतीत होता है कि तुम्हारा कोमल स्पर्श पाकर कठोर पत्थर भी पिघलकर जल बन गया है। तुम्हारे शरीर का कोमल स्पर्श बाँस और बबूल जैसे रसहीन काँटेदार वृक्षों से भी शेफालिका के फूलों की वर्षा होने लगी है। कवि का मन भी बाँस और बबूल की भाँति शुष्क और दूंट हो गया था, अब बच्चे की मुसकान को देखकर उसका मन भी शेफालिका की भाँति सरस और सुंदर हो गया है।

2. तुम मुझे पाए नहीं पहचान?
देखते ही रहोगे अनिमेष!
थक गए हो?
आँख लूँ मैं फेर?
क्या हुआ यदि हो सके परिचित न पहली बार ?
यदि तुम्हारी माँ न माध्यम बनी होती आज
मैं न सकता देख
मैं न पाता जान
तुम्हारी दंतुरित मुसकान

यह दंतुरित मुसकानआशय(व्याख्या) स्पष्ट करते हुए कवि अपनी ओर एकटक निहारते शिशु को देखकर कहता है- अरे ! तुम मुझे इस तरह एकटक देखे जा रहे हो। समझ गया. तुम मुझे पहचान नहीं पाए हो। परंतु क्या तुम मुझे इस तरह लगातार अपलक देखते ही रहोगे? कहीं ऐसा तो नहीं कि तुम थक गए हो। इसलिए हिलना-डुलना छोड़कर एकटक देखने लगे हो।

अच्छा,।अच्छा! क्या तुम चाहते हो कि मैं अपनी आँखें फेर लूँ। तुम्हें इस तरह न देखू ? कवि कहता है- कोई बात नहीं अगर तुम मुझे पहली बार में नहीं पहचान पाए, तो कोई बात नहीं। मगर यदि तुम्हारी माँ ने हम दोनों को आपस में न मिलाया होता तो आज मैं तुम्हारी यह दंतुरित मुसकान न देख पाता। न ही मनमोहक रूप-छवि के बारे में जान पाता।

3. धन्य तुम, माँ भी तुम्हारी धन्य!
चिर प्रवासी मैं इतर, मैं अन्य !
इस अतिथि से प्रिय तुम्हारा क्या रहा संपर्क
उँगलियाँ माँ की कराती रही हैं मधुपर्क
देखते तुम इधर कनखी मार
और होती जब कि आँखें चार
तब तुम्हारी दंतुरित मुसकान
मुझे लगती बड़ी ही छविमान !

उद्धृत काव्यांश का आशय (व्याख्या) स्पष्ट करें।
उत्तर-कवि नए दाँतों वाले शिशु को संबोधित करके कहता है- तुम अपनी मोहक छवि के कारण धन्य हो। तुम्हारी माँ भी तुम्हें जानकर और तुम्हारी सुंदर रूप-छवि देखने के कारण धन्य है। एक मैं हूँ, जो लगातार लंबी यात्राओं के कारण तुम दोनों से अलग कुछ पराया हो गया हूँ। मैं तुम दोनों की प्यारी दुनिया से पृथक् ‘अन्य व्यक्ति सा हो गया हूँ। ठीक भी है प्रिय शिशु ! मुझ मेहमान से तुम्हारा संबंध-संपर्क ही कितना है ! बहुत कम।

यह तो तुम्हारी माँ है जो तुम्हें अपनी उँगलियों से मधुपर्क चटाती रहती और वात्सल्य भरा प्यार देती रहती है। तुम जब तिरछी नजर से मुझे देखकर अपना मुँह फेर लेते हो, और उसके बाद तुमसे आँखें मिलती हैं। तुम्हारा-मेरा स्नेह प्रकट होता है, तब तुम मुसकरा पड़ते हो। सच कहूँ, तुम्हारे उगते हुए दाँतों वाली तुम्हारी मुसकान मुझे बहुत सुंदर लगती है। मैं उस मुसकान पर मुग्ध हो जाता हूँ।

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