पाठ 7, छाया मत छूना, गिरिजाकुमार माथुर,हिंदी कविता क्लास 10 ,नसरत सलूशन

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छाया मत छूना कवि परिचय

छाया मत छूना के कवि का जन्म सन् 1918 में मध्य प्रदेश के गुना में जन्मे, कवि गिरिजा कुमार माथुर की प्रारंभिक शिक्षा झाँसी उत्तर प्रदेश में हुई। तत्पश्चात उन्होंने अंग्रेजी में एम.ए. तथा एल. एल. बी. की उपाधि लखनऊ से प्राप्त की। शुरू में कुछ समय तक वे वकील रहे। बाद में वे आकाशवाणी और दूरदर्शन में कार्यरत रहे। उनका निधन सन् 1994 में हुआ।

गिरिजाकुमार माथुर के कविता संग्रह

  • नाश और निर्माण,
  • तार सप्तक
  • धूप के धान,
  • मुझे और अभी कहना है
  • शिलापंख चमकीले,
  • मैं वक़्त के हूँ सामने
  • भीतरी नदी की यात्रा
  • पृथ्वी कल्प

उनके नाटक

जन्म कैद (नाटक),

गिरिजाकुमार माथुर के आलोचना

  • नई कविता : सीमाएं दो पाटों की दुनिया
  • बरसों के बाद कभी
  • मेरे सपने बहुत नहीं हैं
  • हम होंगे कामयाब
  • ढाकबनी
  • इतिहास की कालहीन कसौटी
  • छाया मत छूना
  • कौन थकान हरे जीवन की
  • आज हैं केसर रंग रंगे वन
  • पन्‍द्रह अगस्‍त
  • ख़ुशबू बहुत है
  • अनकही बात
  • मैं कैसे आनन्‍द मनाऊँ
  • भटका हुआ कारवाँ और
  • संभावनाएं माथुर जी की प्रमुख कृतियां हैं

छाया मत छूना नयी कविता के कवि गिरिजाकुमार माथुर रोमानी मिजाज के कवि माने जाते हैं। वे विषय की मौलिकता के पक्षधर तो हैं परंतु शिल्प की विलक्षणता को नजरअंदाज़ करके नहीं। चित्र को अधिक स्पष्ट करने के लिए वे वातावरण के रंग को भरते हैं। वे मुक्त छंद में ध्वनि साम्य के प्रयोग के कारण तुक के बिना भी कविता में संगीतात्मकता संभव कर सके हैं। भाषा के दो रंग उनकी कविताओं में मौजूद हैं। वे जहाँ रोमानी कविताओं में छोटी-छोटी ध्वनि वाले बोलचाल के शब्दों का प्रयोग करते हैं, वहीं क्लासिक मिज़ाज की कविताओं में लंबी और गंभीर ध्वनि वाले शब्दों को तरजीह देते हैं।

पाठ 7, छाया मत छूना हिंदी कविता क्लास 10 वीं

(1 .) छाया मत छूना
छाया मत छूना
मन, होगा दुख दूना।
जीवन में हैं सुरंग सुधियाँ सुहावनी
छवियों की चित्र-गंध फैली मनभावनी;
तन-सुगंध शेष रही, बीत गई यामिनी,
कुंतल के फूलों की याद बनी चाँदनी।
भूली-सी एक छुअन बनता हर जीवित क्षण-
छाया मत छूना
मन, होगा दुख दूना।

प्रसंग-

प्रस्तुत काव्य पंक्तियाँ हमारी पाठ्य पुस्तक ‘क्षितिज’ के अंतर्गत संकलित कवि गिरिजा
कुमार माथुर की कविता ‘छाया मत छूना मन’ से उद्धृत हैं। इस कविता में कवि ने बताया है कि जीवन
में सुख और दुःख दोनों ही होते हैं। जीवन के बीते सुखों की स्मृति वर्तमान के दुःख को और गहरा
करती है। इससे दु:ख घटने के बजाय दूना होता है। कवि की मान्यता है कि अतीत का मोह छोड़कर
वर्तमान से जूझते हुए सुंदर और सुखद भविष्य का वरण करना चाहिए।


कविता का व्याख्या, आशय, सार , भावार्थ

छाया मत छूना कविता में कवि गिरिजाकुमार माथुर कहता है कि ओ जीवन की राह के राही मनुष्य तुम अतीत की छाया को मत छूना क्योंकि ऐ पगले मन! इससे वर्तमान का दु:ख घटने की बजाय बढ़कर दूना होता है। जीवन में सुखद सुधिायों (यादों) की अनेक’ सुहावनी गलियाँ हैं, उनमें जीवन के अनेक सुंदर चित्र और मन को लुभाने वाली सुगंध; फैले हुए हैं। जीवन की जो रातें बीतकर अतीत हो चुकी उनकी केवल यादें ही बची हुई हैं। इसी जीवन का प्रत्येक वर्तमान क्षण अतीत में बदल जाता है। इसलिए ऐ मन। तुम अतीत के विषय में मत सोचो क्योंकि इससे दु:ख घटने की जगह दूना होगा, बढ़ेगा।

(2 .) यश है या न वैभव है, मान है न सरमाया;
जितना ही दौड़ा तू उतना ही भरमाया।
प्रभुता का शरण-बिंब केवल मृगतृष्णा है,
हर चंद्रिका में छिपी एक रात कृष्णा है।
जो है यथार्थ कठिन उसका तू कर पूजन-

छाया मत छूना
मन, होगा दुख दूना।

कविता का व्याख्या

छाया मत छूना कविता में कवि मन को सचेत करता हुआ आगे कहता है कि ऐ मन! यश, वैभव, मान और धन के पीछे तू इस जीवन में जितना ही दौड़ा उतना ही तुझे भ्रम हुआ। क्योंकि यहाँ इस संसार में अंतिम सत्य उपर्युक्त में से कुछ भी नहीं। बड़प्पन में केवल धोखा छिपा हुआ है। मृगतृष्णा अर्थात् भटकाव ही उस झूठी प्रभुता की शरण-स्थली है। हर चांदनी के पीदे एक काली रात छिपी हुई है। इसलिए भटकावों में न उलझकर तू जीवन के कठिन-कठोर यथार्थ अर्थात् सत्य का सामना कर। उस कर्म की राह पर चल। अतीत की स्मृतियों को छोड़ क्योंकि इनसे दु:ख घटने की बजाय बढ़ता है; दूना होता है।


(3 .) दुविधा-हत साहस है, दिखता है पंथ नहीं,
देह सुखी हो पर मन के दुख का अंत नहीं।
दुख है न चाँद खिला शरद-रात आने पर,
क्या हुआ जो खिला फूल रस-बसंत जाने पर?
जो न मिला भूल उसे कर तू भविष्य वरण,
छाया मत छूना
मन, होगा दुख दूना।

कविता का व्याख्या, आशय, सार

छाया मत छूना कविता में कवि वर्तमान की चर्चा करता हुआ मनुष्य को भविष्य के वरण का संकेत देता हुआ कहता है कि
वर्तमान समय कठिन है। अनेकों दुविधाएं सामने खड़ी हैं। साहस क्षीण (कमजोर) हो गया है, ऐसे में
जीवन का मार्ग नहीं सूझ रहा। शरीर तो सुखी है लेकिन मन में अनेकों दु:ख हैं। शरद की रात में चांद
के न खिलने का दु:ख है अर्थात् वर्तमान यदि नाना प्रकार के कष्टों और दु:खों से भरा है तो भी कया
हुआ? यदि बसंत बीत जाने पर जीवन का उपवन पुष्पित हुआ अर्थात् खुशियाँ देर से आई तो भी क्या
हुआ? तू बीते समय के दुखों को भूलकर उस भविष्य की सुधिा ले, उसका वरण कर जो सुंदर सुखद
और बाधामुक्त होगा। ऐ मन तू अतीत की सुधियों में उसकी छाया में न भूला क्योंकि इससे दुःख घटने
की जगह बढ़ेगा, दूना होगा।

प्रश्न-अभ्यास

1. कवि ने कठिन यथार्थ के पूजन की बात क्यों कही है?

उत्तर- कवि विगत स्मृतियों को छोड़कर कठिन वर्तमान के यथार्थ के पूजन की बात इसलिए करता है
क्योंकि इसका संबंध सुंदर भविष्य से है। वर्तमान की कठिनाइयां झेलकर ही सुंदर और मंगलमय
भविष्य की प्राप्ति हो सकती है।

2. भाव स्पष्ट कीजिए-

प्रभुता का शरण-बिंब केवल मृगतृष्णा है,
हर चंद्रिका में छिपी एक रात कृष्णा है।

उत्तर इसके लिए कविता के दूसरे अवतरण की व्याख्या देखें।

3. ‘छाया’ शब्द यहाँ किस संदर्भ में प्रयुक्त हुआ है? कवि ने उसे छूने के लिए मना क्यों किया है?

उत्तर-छाया शब्द यहाँ अतीत की स्मृतियों और दुःखों के संदर्भ में प्रयुक्त हुआ है। कवि उसे न छूने की बात इसलिए करता है क्योंकि इससे दुःख दूना होता है।

4.कविता में विशेषण के प्रयोग से शब्दों के अर्थ में विशेष प्रभाव पड़ता है, जैसे कठिन यथार्थ।

कविता में आए ऐसे अन्य उदाहरण छाँटकर लिखिए और यह भी लिखिए कि इससे शब्दों के अर्थ में क्या विशिष्टता पैदा हुई?

उत्तर- यष्टा, चित्र-गंधा, चंद्रिका, शरणबिंब, शरद-रात आदि।

5. ‘मृगतृष्णा’ किसे कहते हैं, कविता में इसका प्रयोग किस अर्थ में हुआ है?

उत्तर मृगतष्णा रेगिस्तान में बालू को जल समझकर प्यास से भटकते हिरन के भ्रम को कहते हैं कविता में इसका प्रयोग व्यक्ति द्वारा अतीत को दुःख कम करने वाला समझकर उसका स्मरण करने में, और प्रभुता के अर्थ में किया गया है।

6. ‘बीती ताहि बिसार दे आगे की सुधि ले’ यह भाव कविता की किस पंक्ति में झलकता है?

उत्तर ‘जो न मिला भूल उसे कर तू भविष्य वरण’ में बीती ताहि बिसार दे आगे की सुधि ले’ का भाव झलकता है।

7. कविता में व्यक्त दुख के कारणों को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर ‘अतीत की स्मृति’ ही कविता में व्यक्त दुःख का कारण है। उपलब्धि और अनुपलब्धिा की चिंता भी इसका दूसरा पहलू है।

रचना और अभिव्यक्ति

8. ‘जीवन में हैं सुरंग सुधियाँ सुहावनी’, से कवि का अभिप्राय जीवन की मधुर स्मृतियों से है। आपने अपने जीवन की कौन-कौन सी स्मृतियाँ संजो रखी हैं?

9.’क्या हुआ जो खिला फूल रस-बसंत जाने पर?’ कवि का मानना है कि समय बीत जाने पर भी
उपलब्धि मनुष्य को आनंद देती है। क्या आप ऐसा मानते हैं? तर्क सहित लिखिए।

पाठेतर सक्रियता
  • आप गर्मी की चिलचिलाती धूप में कभी सफ़र करें तो दूर सड़क पर आपको पानी जैसा दिखाई
    देगा पर पास पहुंचने पर वहाँ कुछ नहीं होता। अपने जीवन में भी कभी-कभी हम सोचते कुछ
    हैं. दिखता कुछ है लेकिन वास्तविकता कुछ और होती है। आपके जीवन में घटे ऐसे किसी अनुभव
    को अपने प्रिय मित्र को पत्र लिखकर अभिव्यक्त कीजिए।
  • कवि गिरिजाकुमार माथुर की ‘पंद्रह अगस्त’ कविता खोजकर पढ़िए और उस पर चर्चा कीजिए।

शब्द-संपदा

छाया- भ्रम, दुविधा
सुरंग- रंग-बिरंगी
छवियों की चित्रगंध– चित्र की स्मृति के साथ उसके आसपास की गंध का अनुभव
यामिनी- तारों भरी चाँदनी रात
कुंतल- लंबे केश
सरमाया- पूँजी
प्रभुता का शरण-बिंब- बड़प्पन का अहसास
दुविधाहत साहस- साहस होते हुए भी दुविधाग्रस्त रहना

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