भारतीय अर्थव्यवस्था के क्षेत्रक पाठ 2 लघु उत्तरीय प्रश्न। Ncert Solution For Class 10th Eco.

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भारतीय अर्थव्यवस्था के क्षेत्रक पाठ 2 लघु उत्तरीय प्रश्न। Ncert Solution For Class 10th Eco. के इस ब्लॉग पोस्ट पर आप सभी छात्र-छात्राओं का स्वागत है, इस पोस्ट के माध्यम से आप सभी को पाठ से संबंधित जो भी महत्वपूर्ण परीक्षा उपयोगी प्रश्न हैं, उन सभी प्रश्नों का उत्तर इस पोस्ट पर कवर किया गया है, जो कई बार पिछले परीक्षाओं में पूछे जा चुके हैं, और आने वाले परीक्षा में भी पूछे जा सकते हैं, इसलिए यदि आप इस पोस्ट पर अभी हैं, तो कृपया करके पूरा ब्लॉग पढ़ें जिसे आपकी परीक्षा की तैयारी और भी अच्छी हो जाएगी तो चलिए शुरू करते हैं ।

भारतीय अर्थव्यवस्था के क्षेत्रक पाठ 2 लघु उत्तरीय प्रश्न के उत्तर

1 क्या आप मानते है कि आर्थिक गतिविधियों का प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक क्षेत्र में विभाजन की उपयोगिता है। व्याख्या करें कि कैसे ?
उत्तर-आर्थिक गतिविधियों को प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक क्षेत्रक में विभाजन की उपयोगिता निम्नांकित दो कारणों से है-
(क) रोजगार पद्धति का विश्लेषण- आर्थिक गतिविधियों के विभाजन के आधार पर यह विश्लेषण किया जा सकता है कि किस क्षेत्रका में अधिक लोग कार्य कर रहे हैं, किस क्षेत्र में बेरोजगारी अधिक है तथा अर्थव्यवस्था के किस क्षेत्र में अप्रत्यक्ष बेरोजगारी कितनी मात्रा में है। इस विश्लेषण के आधार पर सरकार रोजगार नीति का निर्धारण करती है।
(ख) जी० डी० पी० की गणना- आर्थिक गतिविधियों के विभाजन के आधार पर जी० डी० पी० अर्थात् सकल घरेलू उत्पाद की गणना आसानी से की जा सकती है। इससे यह पता चलता है कि सकल घरेलू उत्पाद में किस क्षेत्र का योगदान कितना है।
2 “भारतीय अर्थव्यवस्था के क्षेत्रक” अध्याय में आए प्रत्येक क्षेत्रक को रोजगार और सकल घरेलू उत्पाद (जी० डी० पी०) पर ही क्यों केन्द्रित करना चाहिए ? चर्चा करें।
उत्तर- भारतीय अर्थव्यवस्था के क्षेत्रक” अध्याय में हमने इस बात की जानकारी प्राप्त की है कि मनुष्य की आर्थिक गतिविधियों को प्राथमिक, द्वितीयक एवं तृतीयक क्षेत्रक में विभाजित किया जाता है। प्राथमिक क्षेत्रक का सम्बन्ध उन गतिविधियों से होता है जो प्रकृति से प्राप्त वस्तुओं से सम्बन्धित होती है। जैसे- खेती करना, मछली पकड़ना, खान खोदना आदि।
द्वितीयक क्षेत्रक का सम्बन्ध उन गतिविधियों से होता है जो प्राथमिक चीजों का प्रयोग करके उद्योगों द्वारा उन्हें उपयोगी चीज में बदलती है। जैसे-चीनी तैयार करना, कागज बनाना, कपड़ा तैयार करना आदि। तृतीयक क्षेत्रक का सम्बन्ध वस्तुओं के उत्पादन से नहीं होता वरन् सेवाओं के निर्माण से होता है। जैसे- वकालत, डॉक्टरी, बैंक, स्कूलों में शिक्षा उपलब्ध कराना आदि।
जब हमने विभिन्न क्षेत्रकों की परिभाषा जान ली तो उसका मूल्याकंन भी करना चाहिए कि उनका सकल घरेलू उत्पाद और रोजगार के क्षेत्र में क्या योगदान रहा है। समय के साथ तीनों क्षेत्रकों के योगदान में (1973 से 2003 तक) वृद्धि हुई। परन्तु सकल घरेलू उत्पाद में सबसे अधिक योगदान तृतीयक क्षेत्रक का रहा परन्तु रोजगार के क्षेत्रक में बढ़ा तो अवश्य परन्तु अब भी भारत की 60% जनसंख्या प्राथमिक क्षेत्रक में लगी हुई है।

भारतीय अर्थव्यवस्था के क्षेत्रक 10th क्लास Ncert Solution

3 तृतीयक क्षेत्रक अन्य क्षेत्रकों से भिन्न कैसे है? सोदाहरण व्याख्या करें।
उत्तर-तृतीयक क्षेत्र में जो क्रियाएँ होती हैं वे प्राथमिक और द्वितीयक क्षेत्रों में सहायता करती हैं। ये क्रियाएँ अपने आप उत्पादक नहीं होता है। परन्तु उत्पादक क्रियाओं की सहायक हो सकती हैं। उदाहरण के लिए प्राथमिक और द्वितीयक क्षेत्रों द्वारा किया जाने वाला उत्पादन ट्रकों या रेलों द्वारा अन्य स्थानों पर पहुँचाया जाता है।
कभी-कभी माल को गोदामों में भी रखा जाता है। अन्य व्यापारियों से टेलीफोन, पत्रों द्वारा बात करके या बैंकों से रुपया उधार लेकर माल का भुगतान किया जाता है। ये सारे काम तृतीयक क्रियाओं के उदाहरण हैं। इसका अर्थ है कि तृतीयक क्षेत्र सेवाकार्य करता है न कि उत्पादन कार्य । इसीलिए इसे ‘सेवा क्षेत्र के नाम से भी जाना जाता है।
4 प्रच्छन्न बेरोजगारी से आप क्या समझते हैं ? शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों की उदाहरण देकर व्याख्या करें।
उत्तर-प्रच्छन्न बेरोजगारी या गुप्त बेरोजगारी-भारत में किसान उत्पादन के लिए पुराने ढंग ही प्रयोग करते हैं क्योंकि वे गरीब हैं वे भूमि के स्वामी भी नहीं हैं। अगर खेती के आधुनिक तरीकों को अपनाया जाए तो ऐसी स्थिति उत्पन्न नहीं हो सकती है जबकि भूमि के किसी टुकड़े पर परिवार के तीन सदस्यों के स्थान पर दो सदस्य ही काम चला सकते हैं, परन्तु इसके अभाव के कारण तीनों सदस्यों को उसी खेत पर काम करना पड़ता है।
इस प्रकार उत्पन्न हुई बेरोजगारी को प्रच्छन्न या गुप्त बेरोजगारी कहा जाता है। प्रच्छन्न बेरोजगारी आमतौर पर ग्रामीण क्षेत्रों में पाई जाती है क्योंकि वहाँ बहुत से परिवारों के पास छोटे खेत होते हैं परन्तु उन पर परिवार के सारे सदस्य काम करते हैं। जहाँ दो व्यक्ति खेती के काम को पूरा कर सकते हैं वहाँ पाँच सदस्य लगे हुए हैं परन्तु सबके लिए वहाँ पूरा काम नहीं हो तो।
ऐसे परिवार के दो या तीन सदस्य यदि कोई और काम कर लें, जैसे किसी कारखाने में काम कर लें तो खेती के कार्य को फर्क नहीं पड़ेगा। इसी प्रकार शहरी क्षेत्रों में भी प्रच्छन्न बेरोजगारी पाई जाती है। वहाँ भी मजदूरों, पेंटरों, प्लम्बरों आदि रोजगारों को महीने में केवल 10 से 15 दिन तक ही काम
मिलता है, बाकी दिन वे बेकार रहते हैं। इस बेरोजगारी को भी हम प्रच्छन्न बेरोजगारी कहते हैं।
5 आर्थिक गतिविधियाँ रोजगार की परिस्थितियों के आधार पर कैसे वर्गीकृत की जाती हैं ?
उत्तर-रोजगार की परिस्थितियों के आधार पर आर्थिक गतिविधियों दो भागों में वर्गीकृत की जाती हैं-
(क) संगठित क्षेत्रक- वैसे उद्यम अथवा कार्य-स्थान जहाँ रोजगार की अवधि नियमित होती है तथा लोगों के पास सुनिश्चित काम होता है, संगठित क्षेत्रक के अन्तर्गत आते हैं। संगठित क्षेत्रक के उद्यम सरकार द्वारा पंजीकृत होते हैं तथा उन्हें सरकारी नियमों एवं विनियमों का अनुपालन करना पड़ता है।
(ख) असंगठित क्षेत्रक- वैसे उद्यम अथवा कार्य स्थान जहाँ रोजगार की अवधि अनियमित होती है तथा लोगों के पास सुनिश्चित काम नहीं होता, असंगठित क्षेत्रक के अंतर्गत आते हैं। ऐसे उद्यमों का सरकार द्वारा पंजीकरण नहीं किया जाता है। इस क्षेत्रक के नियम और विनिमय तो होते हैं, परन्तु उनका अनुपालन नहीं किया जाता है।
6 ‘असंगठित क्षेत्रक में श्रमिकों का शोषण किया जाता है। क्या आप इस विचार से सहमत हैं? अपने उत्तर के समर्थन में कारण दें।
उत्तर-असंगठित क्षेत्रक के श्रमिकों का चाहे वे ग्रामीण क्षेत्रों के हों (जैसे- भूमिहीन कृषि श्रमिक, छोटे और सीमांत किसान. फसल कटाईदार, बुनकर, बढ़ई. लोहार आदि) या फिर शहरी क्षेत्रों के हों (जैसे- लघु उद्योगों के श्रमिक, निर्माण, व्यापार और परिवहन में लगे आकस्मिक श्रमिक, सड़कों पर घूमने वाले फेरीदार, सिर पर बोझ उताने वाले श्रमिक आदि)- सबका आर्थिक और सामाजिक शोषण होता है।
विशेषकर जो श्रमिक अनुसूचित जन-जाति, अनुसूचित जाति, पिछड़े हुए वर्गों से सम्बन्ध रखते हैं उनमें से अधिकतर असंगठित क्षेत्रक से सम्बन्ध रखते हैं। उन्हें
न केवल आर्थिक शोषण का शिकार बनना पड़ता है वरन् उन्हें सामाजिक अन्याय का भी सामना करना पड़ता है।
कई बार उन्हें कुँओं से पानी भरने नहीं दिया जाता, कई बार उन्हें विशेष मन्दिरों में जाने नहीं दिया जाता। उनके पूर्ण व्यक्तित्व के विकास के लिए हमें हर प्रकार के आर्थिक और सामाजिक शोषण से उन्हें बचाना होगा। तभी वे राष्ट्र के सच्चे नागरिक बनकर देश की सेवा कर सकेंगे।

भारतीय अर्थव्यवस्था के क्षेत्रक Class 10 Notes in hindi

7 संगठित और असंगठित क्षेत्रकों की रोजगार परिस्थितियों की तुलना करें।
उत्तर- संगठित और असंगठित क्षेत्रकों की रोजगार परिस्थितियों की तुलना-
(क) संगठित क्षेत्रक में जबकि विशेष नियमों का पालन होता है जिसके कारण श्रमिकों के हितों की रक्षा हो जाती है परन्तु असंगठित क्षेत्रक में ऐसे किन्हीं विशेष कानूनों का पालन नहीं होता।
(ख) संगठित क्षेत्रक में श्रमिकों को उचित वेतन और वह भी ठीक समय पर मिल जाता है परन्तु असंगठित क्षेत्रक में ऐसा कम ही होता है।
(ग) संगठित क्षेत्रक में श्रमिकों की नौकरी प्रायः पक्की होती है और असंगठित क्षेत्रक में नहीं।
(घ) संगठित क्षेत्रक में श्रमिकों को सरकारी नियमों के अन्तर्गत वेतन के अतिरिक्त भविष्य निधि, चिकित्सीय और अन्य भत्ते तथा वेतन सहित छुट्टियाँ मिल जाती
है वहीं प्रायः असंगठित क्षेत्रक में ऐसा कुछ नहीं होता।
(ङ) संगठित क्षेत्रक में रिटायर होने के पश्चात् पेंशन आदि मिल जाती है वहीं असंगठित क्षेत्रक में ऐसा कुछ नहीं होता।
8 रा० ग्रा० रा० गा० अ०- 2005 (NREGA 2005) के उद्देश्यों की व्याख्या करें।
उत्तर-रा० ग्रा० रो० गा० अ०-2005 (नरेगा-2005) के प्रमुख उद्देश्य निम्नांकित है-
(क) इस अधिनियम के अंतर्गत उन सभी लोगों, जो काम करने में सक्षम हैं और जिन्हें काम की जरूरत है, को सरकार द्वारा वर्ष में 100 दिन के रोजगार की गारंटी दी गई है।
(ख) प्रस्तावित रोजगारों का एक-तिहाई भाग महिलाओं के लिए आरक्षित होगा।
(ग) यदि सरकार किसी प्रार्थी को 15 दिनों के भीतर रोजगार उपलब्ध नहीं करा पाती है तो वह व्यक्ति दैनिक रोजगार भत्ता का अधिकारी होगा।
(घ) इस अधिनियम के अंतर्गत उस तरह के कामों को वरीयता दी जाएगी. जिनसे भविष्य में भूमि से उत्पादन बढ़ाने में मदद मिलेगी।
9 अपने क्षेत्र से उदाहरण देकर सार्वजनिक और निजी क्षेत्र की गतिविधियों एवं कार्यों की तुलना करें।
उत्तर-उद्योगों को स्वामित्व के आधार पर निम्नांकित बम भली प्रकार विनामित किया जा सकता है-
(क) सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योग- ये उद्योग, जिनका स्वामिल राज्य सरकारमा केन्द्रीय सरकार के किसी संगठन के पास होता है, सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योग कहलाते है। ऐसे उद्योगों के उदाहरण – भारतीय रेल, मिलाई, दुर्गापुर आदि में लोहे और इस्पात के उद्योग, जहाज निर्माण का योग आदिऐसे उद्योग राज्य द्वारा अपने नियन्त्रण में चलाए जाते है और यही सरकारी कानून लागू होते हैं।
(ख) निजी क्षेत्र के उद्योग-ये उद्योग जिनका स्थामिद कुछ व्यक्तियों अथवा फर्मों या कम्पनियों के पास होता है उन्हें निजी क्षेत्र के उद्योग कहते है। निजी क्षेत्र के उद्योगों के उदाहरण है- जमशेदपुर में स्थित लाहा व इस्पात उद्योग। दिल्ली में ऐसे उद्योग हैं प्योर ड्रिंक्स, जो कैम्या कोला आदि बनाते हैं और ब्रिटानिया उद्योग, जो डबल रोटी और बिस्कुट इत्यादि बनाते है।
10 सार्वजनिक क्षेत्रक की गतिविधियों के कुछ उदाहरण दें और व्याख्या को कि सरकार द्वारा इन गतिविधियों का कार्यान्वयन क्यों किया जाता है? अथवा, व्याख्या करें कि किसी देश के आर्थिक विकास में सार्वजनिक क्षेत्रक कैसे योगदान करता है?
उत्तर-सार्वजनिक क्षेत्रक का होना अनिवार्य है, इसके मुख्य कारण निम्नांकित है-
(क) सार्वजनिक क्षेत्रक बहुत सी आवश्यक वस्तुओं को उचित दामों में उपलब्ध करवाता है जो कि निजी क्षेत्र कभी भी नहीं कर सकता।
(ख) सार्वजनिक क्षेत्रक भारी उद्योगों का निर्माण कर सकता है क्योंकि इनमें बहुत से धन की आवश्यकता होती है। निजी क्षेत्रक में ऐसा करना प्रायः असम्भव सा होता है।
(ग) सार्वजनिक क्षेत्रक का मुख्य उद्देश्य लोगों की सेवा करना होता है क्योकि लाभ कमाना उसका ध्येय नहीं होता, जबकि निजी क्षेत्र का मुख्य उदेश्य अपने लाभ के अतिरिक्त और कुछ नहीं होता।
(घ) सार्वजनिक क्षेत्रक पर अधिकतर सरकार का नियन्त्रण होता है इसलिए जन साधारण के कल्याण हेतु दह कई बार अपने पास से भी व्यय करके लोगों के भले के लिए अनेक वस्तुओं का उत्पादन कर देती है। लोगों को कई बार गेहूँ, चावल आदि वस्तुओं को सार्वजनिक क्षेत्रक द्वारा सस्ते दामों पर भी उपलब्ध करा देती है।
रेलवे, डाकघर, बड़े-बड़े अस्पताल, कारखाने आदि सरकार द्वारा की जाने वाली सार्वजनिक क्षेत्र की कुछ मुख्य सार्वजनिक गतिविधियों है जिससे जनसाधारण को बहुत सा लाभ रहता है। लगभग सभी सार्वजनिक क्षेत्रक की गतिविधियों देश के आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान देती है इसलिए उनका होना अनिवार्य है।
11 असंगठित क्षेत्रक के श्रमिकों को निम्नांकित मुद्दों पर संरक्षण की आवश्यकता है- मजदूरी, सुरक्षा और स्वास्थ्य। उदाहरण सहित व्याख्या करें।
उत्तर-असंगठित क्षेत्रक में काम करने वाले श्रमिकों को संरक्षण देने के निम्नांकित कारण हैं-
(क) असंगठित क्षेत्रक में काम करने वाले श्रमिकों को कोई निश्चित काम नहीं मिलता और कई दिन तक उन्हें बेकार रहना पड़ता है। इसलिए उन्हें संरक्षण की आवश्यकता है।
(ख) असंगठित क्षेत्रक में काम करने वालों का वेतन प्रायः कम होता है और वह भी निश्चित नहीं होता इसलिए उन्हें संरक्षण दिया जाना चाहिए।
(ग) असंगठित क्षेत्रक में काम करने वाले श्रमिकों को कोई निश्चित छुट्टियाँ भी नहीं मिलती, इसलिए वे काम के नीचे पिस कर रह जाते हैं।
(घ) उन्हें रिटायर होने के पश्चात् कोई पेंशन आदि भी नहीं मिलती, इसलिए उन्हें संरक्षण की आवश्यकता होती है।
(ङ) असंगठित क्षेत्रक में काम करने वालों की नौकरी भी पक्की नहीं होती और जब चाहे उन्हें हटा दिया जाता है। इसलिए उनके लिए संरक्षण अति आवश्यक है।
(च) फर्मों और कारखानों के मालिक, विशेषकर असंगठित क्षेत्रक में बहुत से सरकारी नियमों का पालन भी नहीं करते इसलिए उन्हें नियमों में बाँधने के लिए अमिकों को संरक्षण देना आवश्यक है।
12 भारत में तृतीयक क्षेत्रक इतना महत्त्वपूर्ण क्यों हो गया है ?
उत्तर-भारत में तृतीयक क्षेत्रक के महत्त्वपूर्ण होने के कारण-
(क) किसी भी देश में अनेक सेवाओं, जैसे- अस्पताल, शैक्षिक संस्थाएँ, डाक व तार सेवा, थाना, कचहरी, ग्रामीण प्रशासनिक कार्यालय, नगर निगम, रक्षा, परिवहन, बैंक, बीमा कंपनी इत्यादि की आवश्यकता होती है इन्हें बुनियादी सेवाएँ माना जाता है। किसी विकासशील देश में इन सेवाओं प्रबंधन की जिम्मेदारी सरकार उठाती है।
(ख) द्वितीय, कृषि एवं उद्योग के विकास से परिवहन, व्यापार, भण्डारण जैसी सेवाओं का विकास होता है। प्राथमिक और द्वितीयक क्षेत्रक का विकास जितना अधिक होगा, ऐसी सेवाओं की माँग उतनी ही अधिक होगी।
(ग) तृतीय, जैसे-जैसे आय बढ़ती है, कुछ लोग अन्य कई सेवाओं जैसे- रेस्तरां, पर्यटन, शॉपिंग, निजी अस्पताल, निजी विद्यालय, व्यावसायिक प्रशिक्षण इत्यादि की माँग शुरू कर देते हैं। नगरों में, विशेषकर बड़े नगरों में इस द्रुत परिवर्तन को देख सकते हैं।
(घ) चतुर्थ, विगत दशकों में सूचना और संचार प्रौद्योगिकी पर आधारित कुछ नवीन सेवाएँ महत्त्वपूर्ण एवं अपरिहार्य हो गई हैं। इन सेवाओं के उत्पादन मेंतीव्र वृद्धि हो रही है।
13 प्राथमिक क्षेत्रक, द्वितीयक क्षेत्रक तथा तृतीयक क्षेत्रक की व्याख्या करे।
उत्तर-(क) प्राथमिक क्षेत्रक– प्रकृति द्वारा प्रदान की गई वस्तुओं को प्रयोग के लिए एकत्र करने से सम्बन्धित विभिन्न कार्यों को प्राथमिक क्षेत्रक की गतिविधियाँ कहते हैं। खनन, लकड़ी काटना या लम्बरिंग और मत्स्य ग्रहण आदि ऐसी ही कुछ प्राथमिक गतिविधियों है।
(ख) द्वितीयक क्षेत्रक-ये गतिविधियों जो कच्चे माल अथवा प्राथमिक उत्पादों को मानव के लिए उपयोगी वस्तुओं में बदलते है, द्वितीयक गतिविधियों कहलाती हैं। उदाहरण के लिए चीनी उद्योग, कागज उद्योग आदि प्राथमिक गतिविधियों पर निर्भर करते हैं।
(ग) तृतीयक क्षेत्रक-वे गतिविधियों जिनकी विविध क्रियाएँ आधुनिक उद्योगों को सफलतापूर्वक चलाने के लिए अत्यन्त आवश्यक होती है. तृतीयक क्षेत्र की गतिविधियों कहलाती है। तृतीयक क्षेत्रक उद्योगों के उदाहरण है- यातायात, संचार, बैंक, शिक्षा आदि। तृतीयक क्षेत्रक में वस्तुओं का नहीं वरन् सेवाओं का निर्माण किया जाता है। राष्ट्रीय आय का मुख्य आधार यह तृतीयक क्षेत्रकही है चाहे रोजगार का मुख्य आधार अभी भी कृषि या प्राथमिक क्षेत्रक है।

भारतीय अर्थव्यवस्था के क्षेत्रक क्वेश्चन आंसर पाठ 2

14 शहरी क्षेत्रों में रोजगार में वृद्धि कैसे की जा सकती है?
उत्तर-शहरी क्षेत्रों में रोजगार में वृद्धि निम्न प्रकार से की जा सकती है-
(क) उत्पादन की श्रम-गहन तकनीकों को अपनाया जाना चाहिए।
(ख) लघु एवं कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
(ग) विद्युत आपूर्ति. कच्चे माल और यातायात से संबंधित समस्याओं को दूर किया जाना चाहिए जिससे जो उद्योग क्षमता से कम उत्पादन कर रहे हैं. वे अपनी पूर्ण क्षमता का उपयोग कर सके।
(घ) हमारी शिक्षा प्रणाली को रोजगारोन्मुखी बनाया जाना चाहिए। व्यावसायिक शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए।
(ङ) सरकार को चाहिए कि यह ऋण, प्रशिक्षण, विपणन जैसी सुविधाएँ प्रदान कर स्व-रोजगार को प्रोत्साहित करे।
(च) विशेषकर पर्यटन, सूचना एवं प्रौद्योगिकी जैसे सेवा क्षेत्र में रोजगार की व्यापक संभावनाएं है. इन दोत्रों में समुचित आयोजन और सरकारी सहायता की आवश्यकता है।
(छ) लक्षित रोजगार सृजन कार्यक्रमों को पूर्ण लगन एवं ईमानदारी से लागू किया जाना चाहिए।
15 ‘प्रच्छन्न बेरोजगारी’ और ‘मौसमी बेरोजगारी में अंतर स्पष्ट करें।
उत्तर-प्रच्छन्न बेरोजगारी और मौसमी बेरोजगारी में अंतर-

प्रच्छन्न बेरोजगारी मौसमी बेरोजगारी
(a) प्रच्छन्न बेरोजगारी में व्यक्ति कार्य करता हुआ तो दिखाई देता है लेकिन वास्तव में वह बेरोजगार होता है।
(b) ऐसी स्थिति जिसमें बेरोजगारी के आँकड़ों द्वारा दर्शाये गए लोगों से कहीं अधिक संख्या में लोग बेरोजगार हो।
(a) मौसमी बेरोजगारी में किसान या व्यक्ति निश्चित अवधि में काम करने के बाद बेरोजगार हो जाता है।
(b) ऋतु परिवर्तन के हिसाब से बढ़ने वाली बेरोजगारी जो कि अधिकतर कृषि क्षेत्र में पाई जाती है।

16 खुली बेरोजगारी और प्रच्छन्न बेरोजगारी के बीच विभेद करें।
उत्तर-खुली बेरोजगारी और प्रच्छन्न बेरोजगारी के बीच विभेद निम्नांकित तथ्यों के आधार पर किया जा सकता है-

खुली बेरोजगारी प्रच्छन्न बेरोजगारी
(a) इस प्रकार की बेरोजगारी के अंतर्गत लोग पूर्णतः बेरोजगार होते हैं।
(b) इसके अंतर्गत एक भी व्यक्ति को काम उपलब्ध नहीं होता है।
(c) इस प्रकार की बेरोजगारी औद्योगिक क्षेत्रों में पाई जाती है।
(d) इस प्रकार के बेरोजगार लोगों की गणना स्पष्ट रूप से की जा सकती है।
(a) इस प्रकार की बेरोजगारी के अंतर्गत लोग पूर्णतः बेरोजगार होते हैं।
(b) इसके अंतर्गत एक भी व्यक्ति को काम उपलब्ध नहीं होता है।
(c) इस प्रकार की बेरोजगारी औद्योगिक क्षेत्रों में पाई जाती है।
(d) इस प्रकार के बेरोजगार लोगों की गणना स्पष्ट रूप से की जा सकती है।

Jac Board

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