भारत में राष्ट्रवाद पाठ-3 दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर क्लास 10

भारत में राष्ट्रवाद पाठ-3 इतिहास

भारत में राष्ट्रवाद दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

भारत में राष्ट्रवाद पाठ 3 के इस ब्लॉग में आप सभी विद्यार्थियों को इस पाठ से जुड़ी सभी महत्वपूर्ण परीक्षा उपयोगी प्रश्नों के हल , सभी अभ्यास प्रश्नों के हल , पाठ सबंधित दीर्घ उत्तरीय प्रश्नो के हल एवं अन्य सभी रिलेटेड प्रश् का हल भी आपको इस ब्लॉग में पढ़ने को मिलेगा आशा है आप सभी विद्यार्थियों को पढ़ कर कुछ मदद जरूर मिलेगा ।

(1.)गाँधीजी ने असहयोग आंदोलन को एकाएक क्यों रोक दिया, जबकि जोर-शोर पर था ?

उत्तर-दिसंबर सन 1920 के नागपुर अधिवेशन में काँग्रेस ने अपना लक्ष्य स्वराज्य प्राप्त करना घोषित किया। इसके साथ ही असहयोग आंदोलन चलाना भी स्वीकार कर लिया । ऐनी बेसेंट, जिन्ना और विपिनचंद्र पाल इस आंदोलन के पक्ष में नहीं थे। इसलिए उन्होंने काँग्रेस से त्यागपत्र दे दिया। असहयोग आंदोलन के कार्यक्रम थे- स्वदेशी वस्तुओं का प्रयोग, उपाधियों का त्याग, स्थानीय संस्थाओं से मनोनीत पदों का त्याग, सरकारी स्कूलों का त्याग, सरकारी न्यायालयों का बहिष्कार विधानमंडलों के चुनाव में भाग न लेना और सैनिक, क्लर्को आदि की नौकरियों का त्याग ।

महात्मा गाँधी और अन्य नेताओं के प्रयासों से यह आंदोलन शीघ्र ही उग्र रूप धारण कर लिया। गाँधीजी और अन्य महत्त्वपूर्ण नेताओं को जेल में डाल दिया गया। यह आंदोलन दो वर्ष तक सक्रिय रूप से चला, तभी उत्तर प्रदेश में चौरा-चौरी नामक स्थान पर एक भीड़ ने 5 फरवरी को एक पुलिस चौकी को आग लगा दी। महात्मा गाँधी ने चौरा-चौरी की इस हिंसापूर्ण घटना से दुखित होकर इस आंदोलन को समाप्त कर दिया।

पाठ-3 दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर क्लास 10 इतिहास

(2.) नमक यात्रा की चर्चा करते हुए स्पष्ट करें कि यह उपनिवेशवाद के खिलाफ प्रतिरोध का एक असरदार प्रतीक था।

उत्तर-भारत में राष्ट्रवाद पाठ के जरिये हम आज डांडी यात्रा के बारे विस्तार से जानेंगे तो चलिए शुरू करते है -12 मार्च, 1930 ई० को डांडी यात्रा द्वारा गाँधीजी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन का सूत्रपात किया। गाँधीजी के अनुयायियों ने डांडी नामक समुद्र तटीय स्थान पर नमक बनाकर नमक कानून तोड़ा। यह आंदोलन सरकारी आदेशों को न मानने का प्रतीक था। दूसरे शब्दों में, सरकार को चुनौती दी गई कि उसके द्वारा बनाए गए कानून भारत के लोगों के लिए केवल कागजी महल है। डांडी यात्रा और सब लोगों के सामने सरकारी कानून के खिलाफ नमक तैयार करना राष्ट्रीय एकता का एक प्रतीक बन गया और यह उपनिवेशवाद के विरुद्ध एक महत्त्वपूर्ण कदम था-


(क) ब्रिटिश कानून को तोड़ना निःसन्देह उपनिवेशवाद के विरुद्ध एक जबर्दस्त कदम था। देखने को यह समुद्र के पानी से नमक बनाने की प्रक्रिया एक साधारण-सी घटना लगती है परन्तु इसके उपनिवेशवाद के सारे ढांचे को ही हिला कर रख दिया। नमक की आवश्यकता हर व्यक्ति क्या अमीर और क्या गरीब हर एक को पड़ती है। अब नमक पर कर लगाने की बात लोगों को चुभने लगी और धीरे-धीरे वातावरण ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध बनता
चला गया।

(ख) साबरमती आश्रम से डांडी की कोई 240 मील की यात्रा में महात्मा गाँधी और उनके साथियों को अनेक स्थानों पर रुकना पड़ा। हर पड़ाव में ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध नारेबाजी होती रही जिससे राष्ट्रीय भावनाएँ और उत्तेजित होती गई और लोगों में उपनिवेशवाद के प्रति घृणा पैदा होने लगी।

(ग) जैसे ही 6 अप्रैल, 1930 ई० को समुद्र के पानी से नमक बनाया गया सबको यह पता चल गया कि ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध सविनय अवज्ञा आंदोलन का बिगुल बज चुका है। इस प्रकार नमक यात्रा उपनिवेशवाद के खिलाफ प्रतिरोध का एक असरदार प्रतीक बन गई।


(3.) 1921 में असहयोग आंदोलन में शामिल होने वाले सभी सामाजिक समूहों की सूची बनाएँ। इसके बाद उनमें से किन्हीं तीन को चुनकर उनकी आशाओं और संघर्षों के बारे में लिखते हुए यह दर्शाएँ कि वे आंदोलन में शामिल क्यों हुए ?

उत्तर-1921 के असहयोग आंदोलन में समाज के अनेक समूहों ने भाग लिया जिसमें उल्लेखनीय हैं:-
(क) नगरों के मध्य श्रेणी के लोग,
(ख) ग्रामीण क्षेत्रों के किसान लोग,
(ग) जंगली क्षेत्रों के आदिवासियों ने,
(घ) बागान में काम करने वाले विभिन्न प्रकार के लोगों ने ।
इन लोगों ने असहयोग आंदोलन में क्यों भाग लिया- असहयोग आंदोलन में भाग लेने के निम्नांकित कारण थे:-

(क) नगरों में रहने वाले लोगों ने इस आंदोलन में इसलिए भाग लिया कि यदि लोग विदेशी माल का बहिष्कार करेंगे तो उनका अपना बनाया हुआ माल तेजी से बिकेगा और उनकी औद्योगिक इकाइयाँ फिर से काम करने लगेंगी। इससे लोगों के लिए नौकरी के कई नए अवसर खुलेंगे !

(ख) ग्रामीण क्षेत्रों के किसानों ने असहयोग आंदोलन में बढ़-चढ़कर इसलिए भाग लिया कि एक तो उन्हें बड़े-बड़े जमींदारों के अत्याचारों से मुक्ति मिलेगी और दूसरे उन्हें कठोरता से लगान इकट्ठा करने वाले अधिकारियों के जुल्मों से निजात मिलेगी।

(ग) बागान में काम करने वाले विभिन्न प्रकार के लोगों ने इसलिए असहयोग आंदोलन में भाग लिया क्योंकि एक तो उन्होनें बागान की जेल-समान चारदीवारों से बाहर लाने की आज्ञा मिल जाएगी और दूसरे वे बागान मालिकों की दासता और पशु-समान व्यवहार से मुक्ति प्राप्त कर लेंगे और स्वतंत्र वातावरण में जीवन व्यतीत कर सकेंगे।


(4.) भारत में राष्ट्रवाद पाठ के माद्यम से कल्पना करें कि आप सिविल नाफरमानी आंदोलन में हिस्सा लेने वाली महिला हैं। बताएँ कि इस अनुभव का आपके जीवन में क्या अर्थ होता ?

उत्तर-सिविल नाफरमानी आंदोलन में भाग लेने के लिए मुझे एक महिला के नाते कितना फखर होता। मुझे न केवल महात्मा गाँधी जैसे बड़े नेताओं से मिलने का ही सौभाग्य प्राप्त होता वरन् उनके साथ-साथ साबरमती आश्रम से डांडी तक चलते-चलते कितना आनन्द प्राप्त होता। इन 25-26 दिन (12 मार्च, 1930 से 5 अप्रैल, 1930 तक) की यात्रा में स्थान-स्थान पर हमारा स्वागत हुआ, हजारों की संख्या में लोग महात्मा गाँधी को सुनने आये।

लोगों ने जम कर अंग्रेजी सरकार के विरुद्ध नारे लगाए। सारा वातावरण ऐसे बन गया कि मैं सोचने को मजबूर हुई कि वह दिन दूर नहीं जब भारत स्वतंत्र होकर रहेगा। 6 अप्रैल के दिन डांडी स्थान पर समुद्र के किनारे महात्मा गाँधी ने समुद्र के नमकीन पानी से नमक तैयार करना जैसे ही शुरू किया ‘भारत माता जिन्दाबाद’ गाँधीजी जिन्दाबाद ‘हम आजादी लेकर रहेंगे’ आदि नारों से आकाश गूंज उठा।

(5.) राजनीतिक नेता पृथक चुनाव क्षेत्रों के सवाल पर क्यों बँटे हुए थे ?ncert solution

उत्तर-इसका प्रमुख कारण था कि हिंदू, जिनमें दलित भी थे तथा मुसलमान नेता सभी अपने समुदाय के हितों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र चाहते थे, जिससे कि उनकी सीटें सुरक्षित हों तथा उन्हें अपने समुदाय के हितों के लिए सुरक्षा मिल सके। परंतु शीर्ष नेताओं को यह प्रश्न संकीर्णता भरा तथा राष्ट्रीय हितों पर चोट पहुँचाने वाला दिखाई देता था।
इसके बुरे प्रभाव निम्नांकित हो सकते थे:-
(क) भारतीय एकीकरण के मार्ग में यह रोड़ा बनकर अटक सकता था।
(ख) इससे सांप्रदायिकता की भावना को बल मिलता था तथा दंगे भड़क सकते थे।
(ग) मुसलमान अपने आर्थिक और शैक्षणिक विकास की चिंता को पीछे छोड़कर राष्ट्रीय हितों को अनदेखा कर रहे थे।
(घ) इससे अलगाववादी प्रवृत्ति को बल मिलता था।
(ङ) भारतीयों के लिए राजनैतिक और आर्थिक प्रश्नों का हल जरूरी था न कि निजी स्वार्थ | राष्ट्रीय हितों के आगे सारे प्रश्न फीके थे।

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