अधजल गगरी छलकत जाए, निबंध

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अधजल गगरी छलकत जाए मुहावरे का अर्थ

अधजल गगरी छलकत जाए मुहावरे का हिंदी अर्थ इस प्रकार है – जिस मनुष्य के अंदर ज्ञान कम होता है और वह दिखावा अधिक करता है।

पूर्णभरी गागर में छलक नहीं होती। परन्तु अधभरी गागरी सदा छलकती रहती है। जिसका अर्थ होता है ‘रिक्त जल-पात्र अधिक आवाज करता है। मूर्ख और अल्पज्ञ ज्यादा गाल बजाते हैं।
गोस्वामीजी ने लिखा है-
 ‘पंडित सोई जो गाल बजावा। कलि में विद्वान मौन हैं और मूर्ख गाल बजाकर अपने को विद्वान प्रमाणित करने की चेष्टा करते हैं। अल्पज्ञ अपने अधकचड़े ज्ञान पर ही मदान्ध हो जाते हैं। 

मुहावरे का मनुष्य से सम्बन्ध

जिस आदमी के अंदर ज्ञान कम खोखले पन अधिक होते हैं, वह आदमी अपने मुंह मियां मिट्ठू बनने में आगे रहते हैं । अपने धन दौलत ,दान-पुण्य, समाजसेवा, लेन-देन, आध्यात्मिक व धार्मिक रुचि एवं बौध्दिक क्षमता का बढ़ा चढ़ा कर अधिक बखान करने लगता हैं । आज कल इस तरह के लोगों की संख्या दिन प्रति दिन इतनी तेजी से बढ़ रही है कि कभी-कभी हमलोग भी उनकी ईष्या करने लग जाते हैं । परंतु फिर भी उनके मन में संतोष ही होता है।

अधजल गगरी छलकत जाए के इस निबंध में जानते है की वास्तविक विद्वान अवसर आने पर गोष्ठियों और सभाओं में ही अपनी विद्वता का परिचय देते हैं। वे किसी को अपनी विद्वता से आतंकित और अपमानित नहीं करते। परन्तु अल्पज्ञ सदा पागलों की भाँति प्रलाप करते रहते हैं। ऐसे लोग विद्वत्-समाज में हँसी के पात्र बनते हैं और उनकी पोल खुल जाती है। इसीलिए कहा गया हैजिस ढेढ़ी में चने सम्पुष्ट नहीं हुए रहते हैं, वह ढेढ़ी हल्की हवा में ही खड़खड़ाने लगती है। उसी प्रकार अल्पज्ञ अपने थोड़े ज्ञान पर ही घमंड में चूर होकर उसका प्रदर्शन करने लगते हैं। इसलिए कहा गया है- ‘थोथा चना बाजे घना’। जेठ में सूखी नदी आषाढ़ के थोड़े ही वर्षा-जल से इतराकर तटबंधों को तोड़ डालना चाहती है। उसी प्रकार दुष्ट थोड़े धन पर इतरा जाते हैं। 

मुहावरे का मतलब संछिप्त में

इस मुहावरे में कितनी ठोस बात छिपी है, कि घडा आधा भरा हुआ रहता है तो आवाज करता है, घड़ा में पानी छलक या लबालब भर जाता है, तो बिल्कुल भी आवाज नहीं करता है, और न ही छलकता है। पूरा भरे घड़े में भारीपन आ जाती है।वह छिछरापन नहीं रहता है।इसका मतलब साफ है की , छिछरापन व्यक्ति अपने आप को छिपाने के लिए आवाज करता है, और गहराई हमेंशा शांति बनाये रखता है।

यही वजह है कि ज्ञानी मनुष्य बड़बोले कभी नहीं होते है । वह मनुष्य ज्यादा व व्यर्थ कभी नहीं बोलते है। वह व्यक्ति नाप- तोल कर ही हमेशा बोलते हैं।वह मानव जितनी आवश्यकता है उतना ही बोलते हैं। क्योंकि वह अंदर से भरा हुआ रहता हैं। यह गहरापन उनके ज्ञानी होने का सबूत होता है, वह उनकी विद्वता को दर्शाता है। वह व्यक्ति कितने विद्वान हैं ,कितने गुणी हैं , कितने भले हैं , कितने परोपकारी और सदाचारी हैं , यह सभी गुण उनके व्यवहार में, उनके आचरण में, उनकी वाणी में स्पष्ट रूप से झलकता हैं। ऐसे ज्ञानियों व्यक्तियों को किसी के प्रमाण पत्र की कोई जरूरत नहीं होती है , उस व्यक्ति को किसी के प्रचार की करने की कोई जरूरत नहीं होती है। ऐसी महान विभूतियों के आचरण सभी जगह बिना किसी विशेष प्रयास के अपने आप फ़ैल जाती है ।

किन्त, समुद्र और ज्ञानी पुरूष सदा शान्त और मर्यादित रहते हैं। इसीलिए गोस्वामीजी ने कहा है- क्षुद्र नदी चलि भरि उतराई। जस थोरे धन पाय खल बौराई।

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