पाठ 4 आत्मकथ्य हिंदी कक्षा-10 NCERT काव्यांश।आशय भावार्थ अर्थ summary व्याख्या।

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पाठ 4 आत्मकथ्य व्याख्या का परिचय संछिप्त में

पाठ 4 आत्मकथ्य व्याख्या के इस छंद में कवि सभी काव्यांश का अच्छी तरह से व्याख्या किया है, इन सभी छंद में कवि अपनी आत्मकथा को इस तरह व्याख्या किया है कि पढ़ने के पद ऐसा लगता है , मनो  कहीं ऐसा न हो कि तुम्ही मेरी गागर को खाली करने वाले हो। तुम मेरी जीवन रूपी गागर से रस लेकर अपनी गागर भरने वाले हो। अतः जब तुम मुझे खाली करके स्वयं को भरते हो तो तुम मुझे कैसे भरोगे ? कवि कहता है कि यह जीवन एक छलावा है, ऐसी तरह की बातें इस भाग में किया है

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पाठ 4 आत्मकथ्य व्याख्या, कवि Jai Shankar Prasad

(१.) उद्धृत पद का अर्थ (व्याख्या) स्पष्ट कीजिए।

मुरझाकर गिर रहीं पत्तियाँ देखो कितनी आज घनी।

इस गंभीर अनंत-नीलिमा में असंख्य जीवन-इतिहास

यह लो, करते ही रहते हैं अपना व्यंग्य-मलिन उपहास

तब भी कहते हो-कह डालूँ दुर्बलता अपनी बीती। 

तुम सुनकर सुख पाओगे, देखोगे-यह गागर रीति।

उत्तर-पाठ 4 आत्मकथ्य व्याख्या के इस छंद में कवि कहता है कि फलों पर गुंजार करने वाला भ्रमर गुनगुनाकर न जाने अपने मन की कौन-सी वेदना की अभिव्यक्ति कर जाता है। यह पता नहीं चलता है, कि वह उस समय क्या कहता है। घनी पत्तियाँ मुरझाकर जमीन पर गिर रही हैं। आज बहुत अधिक घनी हो रही हैं। तात्पर्य है कि यह विश्व सारहीन है, अतः व्यक्ति की वेदना का कहीं भी अंत नहीं है। आगे कवि कहता है, कि इस गंभीर और आर-पार रहित (अनंत) नीले आकाश के नीचे अनगिनत जीवन के इतिहास बनते-बिगड़ते रहते हैं।

और यह एक विचित्र बात है, कि वे सब अपने आप में अपनी स्थिति पर व्यंग्य करते हैं। अर्थात् जीवन की अनेक रेखाएँ अपने अस्तित्व पर स्वयं हँसती रहती हैं। इस पर भी (जबकि व्यक्ति का अस्तित्व ही भ्रमपूर्ण है) तुम कहते हो कि मैं अपनी दुर्बलता को कह डालूँ। मैं अपने ऊपर बीतने वाली व्यथा को सना दूँ। मेरी जीवन रूपी गागर तो खाली है, अतः तुम शायद मेरी कथा सुनकर कुछ पाओगे, इसमें मुझे संदेह है।

(2.) उद्धृत काव्यांश का आशय (व्याख्या) स्पष्ट करें।


2.किंतु कहीं ऐसा न हो कि तुम ही खाली करने वाले-

अपने को समझो, मेरा रस ले अपनी भरने वाले।

यह विडंबना! अरी सरलते तेरी हँसी उड़ाऊँ मैं।

 भूलें अपनी या प्रवंचना औरों की दिखलाऊँ मैं।

उज्ज्वल गाथा कैसे गाऊँ, मधुर चाँदनी रातों की।

अरे खिल-खिला कर हँसते होने वाली उन बातों की।

उत्तर- पाठ 4 आत्मकथ्य व्याख्या के इस पैराग्राफ में कवि कहता है, कि हे प्रिय ! कहीं ऐसा न हो कि तुम्ही मेरी गागर को खाली करने वाले हो। तुम मेरी जीवन रूपी गागर से रस लेकर अपनी गागर भरने वाले हो। अतः जब तुम मुझे खाली करके स्वयं को भरते हो तो तुम मुझे कैसे भरोगे ? कवि कहता है कि यह जीवन एक छलावा है।

सबसे बड़ा आश्चर्यजनक छल तो यह है कि मैं अपनी सरलता की हँसी उड़ाऊँ। मैं दूसरों की प्रवंचनाओं और भूलों को दूसरों को दिखलाऊँ। अपने जीवन में आने वाली प्रवंचना को याद करके मैं उन मधुर चाँदनी रातों की उज्ज्वलता गाथा को कैसे गाऊँ, जो जीवन में कभी आई थीं। मैं उन रातों की बातों को कैसे बताऊँ, जिनमें हम खिलखिलाकर हँसते थे अर्थात् दुःख के समय सुख को याद करना अपने ऊपर हँसने के समान है। 

(3.) उद्धृत काव्यांश का आशय (व्याख्या) स्पष्ट करें।

3. मिला कहाँ वह सुख जिसका मैं स्वप्न देखकर जाग गया।

आलिंगन में आते-आते मुसक्या कर जो भाग गया।

जिसके अरुण-कपोलों की मतवाली सुंदर छाया में।

अनुरागिनी उषा लेती थी निज सुहाग मधुमाया में।

उसकी स्मृति पाथेय बनी है थके पथिक की पंथा की।

सीवन को उधेड़ कर देखोगे क्यों मेरी कंथा की ? ।

उत्तर-पाठ 4 आत्मकथ्य व्याख्या के इस भाग में कवि अपनी आत्मकथा सुनाते हुए कहता है- जिन सुखों के सपने देख-देखकर मैं जाग जाता था, वे मुझे कभी मिल नहीं पाए। मैं जिस भी प्रिय का आलिंगन करने के लिए बाहें आगे बढ़ाता, वह प्रिय मुसकुरा कर भाग जाता रहा। मेरी कामनाएँ कभी सफल नहीं हो पाईं। मेरी प्रेमिका के लाल-लाल गाल इतने मतवाले और संदर थे कि प्रेममयी उषा भी अपनी सुगंधित मधुर लालिमा उसी से उधार लिया करती थी।

आशय यह है कि मेरी प्रेमिका के लाल कपोल ऊषाकालीन लालिमा से भी मनोरम थे। आज उसी प्रेममयी प्रेमिका की यादें ही मुझ थकित यात्री के लिए संबल बना हुई हैं। उन्हीं के सहारे मेरा जीवन चल रहा है। तो हे मित्र ! क्या तुम मेरी उन यादा को उधेड़-उधेड़ कर उनके भीतर झाँकना चाहते हो? क्या मेरी आत्मकथा पढ़कर मेरे भूले हुए दर्द को फिर से जगाना चाहते हो ? मेरी फटी हुई जिंदगी का तार-तार करके देखना चाहते हो! 

(4.) उद्धृत काव्यांश का आशय (व्याख्या) स्पष्ट करें।

4. छोटे से जीवन की कैसे बड़ी कथाएँ आज कहूँ ? 

क्या यह अच्छा नहीं कि औरों की सुनता मैं मौन रहूँ ?

सुनकर क्या तुम भला करोगे मेरी भोली आत्म-कथा ?

 अभी समय भी नहीं, थकी सोई है मेरी मौन व्यथा।

उत्तर-पाठ 4 आत्मकथ्य व्याख्या में जय शंकर प्रसाद जी कहते हैं- मेरा जीवन बहुत सामान्य-सा है। मैं तुच्छ-सा मनुष्य हूँ। मैं अपने साधारण जीवन की बड़ी-बड़ी यशगाथाएँ कैसे लिखू। इससे तो अच्छा यही है कि मैं औरों की कथाएँ सुनता रहूँ। अपने बारे में मौन रहूँ।

कवि मित्रों को संबोधित करते हुए कहता है- भला तुम मेरी भोली-भाली, सीधी-सादी आत्मकथा को सुनकर क्या करोगे? उसमें तुम्हारे काम की कोई बात नहीं है। और अभी मैंने ऐसी कोई महानता भी अर्जित नहीं की है जिसके बारे में अपने अनुभव लिखू। एक बात और है, मेरे जीवन के सारे दुख- दर्द और अभाव अब शांत हैं। इसलिए मेरे मन में कुछ भी लिखने की उमंग नहीं है।

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