आधुनिक विश्व में चरवाहे पाठ 5 लघु उत्तरीय प्रश्न |NCERT Solution For Class 9th History

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आधुनिक विश्व में चरवाहे पाठ 5 लघु उत्तरीय प्रश्न ,NCERT Solution For Class 9th History के इस पाठ में आप सभी विद्यार्थियों का स्वागत है , आपको इस पोस्ट पर पाठ से जुड़ी हर महत्त्व पूर्ण परीक्षा उपयोगी सवाल का हल इस ब्लॉग पोस्ट पर अध्ययन करने को मिलेगा , इस लिए इस ब्लॉग पोस्ट को पूरा पढ़े , तो चलिए शुरू करते हैं –

आधुनिक विश्व में चरवाहे पाठ 5 लघु उत्तरीय प्रश्न के उत्तर Ncert Solution

1 परती भूमि नियमावली से चरवाहों के जीवन पर क्या असर पड़ा?
उत्तर– परती भूमि नियमावली- औपनिवेशिक अधिकारियों को सभी गैर-कृषि भूमि अनुपजाऊ लगी। इस पर न तो कृषि की जाती थी और न ही कोई आय होती थी।
यह बेकार बंजर या परती भूमि थी। 19वीं शताब्दी के मध्य से बंजर भूमि के कानून बनाये गए। इन कानूनों के अन्तर्गत बंजर भूमि को ले लिया गया तथा उसे कुछ चुने लोगों को दे दिया गया।
इनमें से कुछ गांव के मुखिया थे। इनमें से कुछ भागों में वास्तव में चरागाह भूमि थी। परिणाम यह हुआ कि चरागाह भूमि की कमी हो गई।
2 वन अधिनियम से घरवाहों के जीवन पर क्या असर पड़ा?
उत्तर-उपनिवेशी शासन के समय बहुत से अधिनियम बनाये गए। इन कानूनों के द्वारा कुछ वन जो बहुमूल्य व्यापारिक लकड़ी उत्पन्न करते थे जैसे देवदार या साल, उनको आरक्षित कर दिया गया।
इन पर कोई चराई का काम नहीं किया गया। दूसरे वनों को वर्गीकृत किया गया। इनमें जानवरों को घराने के कुछ अधिकार दे दिए गए। उपनिवेशी अधिकारी विश्वास करते थे कि चराई से पौधों की जड़ें सामप्त हो जाती है।
3 अपराधी जनजाति अधिनियम से चरवाहों के जीवन पर क्या असर पड़ा ?
उत्तर-1871 में उपनिवेशी सरकार ने अपराधी जनजाति कानून पास किया। इस कानून के द्वारा दस्तकारों, व्यापारियों, चरवाहे की कुछ जातियों को अपराधी जाति में वर्गीकृत किया। उनको जन्म और प्रकृति से ही अपराधी जाति में वर्गीकृत किया।
उनको जन्म और प्रकृति से ही अपराधी बताया गया। एक बार यह कानून लागू होने से ये जातियों विशेष वर्गीकृत बस्तियों में रहने लगीं। बिना आशा के उन्हें दूसरे स्थानों पर जाने की आज्ञा नहीं थी। गाँव की पुलिस भी उन पर लगातार नजर रखती थी।
ब्रिटिश अधिकारी उन पर (चलवासी लोगों पर) संदेह करते थे। उपनिवेशी सरकार एक स्थायी जनसंख्या पर शासन करने की इच्छुक थी।

आधुनिक विश्व में चरवाहे नोट्स इन हिन्दी इतिहास

4 चराई कर अधिनियम से चरवाहों के जीवन पर क्या असर पड़ा ?
उत्तर-उपनिवेशी सरकार अपनी आय बढ़ाने के लिए प्रत्येक संभव संसाधन पर अपनी नजर रखती थी। इसलिए भूमि पर, नहर के जल पर, नमक पर यहाँ तक कि जानवरों पर भी कर लगाया गया।
चरवाहों को प्रत्येक जानवर पर जिसे वे चरागाह में चराते थे कर देना पड़ता था। भारत में अधिकतर चरागाहों पर उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य तक कर लगा दिया गया था। प्रति जानवर दर कर बढ़ता गया तथा कर एकत्र करने की प्रक्रिया तेज होती गई।
1850 और 1880 के दशकों के मध्य कर इकट्ठा करने का अधिकार नीलाम होने लगा। ये ठेकेदार अधिक से अधिक कर इकट्ठा करने लगे तथा अपने लिए भी लाभ कमाने लगे। 1880 के बाद सरकार चरवाहों से प्रत्यक्ष रूप से कर वसूल करने लगी।
प्रत्येक चरवाहे को एक पास दिया गया। प्रत्येक चरागाह पट्टी में प्रवेश करते समय चरवाहे को पास दिखाकर उसका कर चुकाना पड़ता था। मवेशियों की संख्या तथा चुकाए जानेवाला कर पास पर अंकित होता था।
5 किन क्षेत्रों में बंजारे पाये जाते है? सामान्यतः वे क्या करते है?
उत्तर-बंजारे उत्तर-प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के गाँवों में पाये जाते हैं। ये अपने जानवरों के लिए अच्छे चरागाहों की तलाश में एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते है तथा हल चलाने वाले जानवरों व अन्य वस्तुओं को ग्रामीणों को बेचते हैं जिससे अपने लिए चारा और अनाज ले सकें।

आधुनिक विश्व में चरवाहे  कक्षा 9 वीं इतिहास अध्याय 5 नोट्स

6 महाराष्ट्र के मगर परवा समुदाय को जीवन को मुख्य लक्षणों का वर्णन करें।
उत्तर-(क) मगर अरवारी महाराष्ट्र प्रमुख परवाला समुदाय है। बारावी शताब्दी के पाल इनकी संख्या 4,07,000 थी।
(ख) बहुत से धंगरगड़रियेहै । ये कुछ कम्बल बनाते है और कुछ चमड़े का काम करते है ।
( ग) ये लोग महाराष्ट्र के मध्य पठार पर मानसून के समय रहते है। यहाँ कम वर्षा होती है ।
( घ) मानसूनमें यह घास का क्षेत्र बन जाता है।
(ड़) अक्टूबर तक घंगर आपने बाजरे की फसल को काट लेते है और पश्चिम की ओर चल पड़ते है। एक महीने में लोग कोकण प्रदेश में पहुंचे है। यहाँ कोंकण के किसान उसका स्वागत करते हैं
( च) खरीफ की फसल काटने के बाद खेत दूसरी फसल के लिए तैयार किए जाते है।
( छ) धंगर भेडोऔर बकरियो के झुंड खेतो को खाद उपलब्ध कराते है तथा फसल के डंठलो को खाते है कोंकण के किसान घंगरों को चावल की आपूति करते है’जो मध्य पठार में कम पैदा होती है । जहां धंगर रहते है ।
(ज) मानसून के आरंभ होने पर ये लोग अपने शुष्क पठार की ओर चलते है क्योंकि भेंडे मानसून दशाएँ सहन कर सकती।
7 राइका कहाँ रहते? उनकी आर्थिक स्थिति और विशेषताएँ लिखें।
उत्तर-राइका राजस्थान के मरुस्थलग पाते है। राहका की आर्थिक स्थिति और विशेषताएँ-
(क) राजस्थान में वर्षा कम होती है इसलिए रा इका कृषि करना कठिन समझते है। कोई फसल पैदा नहीं हो पाती। इसलिए ये लोग मिश्रित कार्य करते है ।
( ख) मानसून के समय बाड़मेर, जैसलमेर, जोधपुर और बीकानेर राइका अपने घरों में ही रहते है जहाँ चरागाह उपलब्ध होते है।
(ग) अक्टूबर में जब चरागाह भूमि शुष्क हो जाती है, राइका चारागाह की खोज में बाहर निकलते है।
( घ) राइका का एक समूह मारू कहलाता है जो ऊँट पालता है तथा दूसरा समूह भेड़और बकरी चराता है।
(ड़) इस प्रकार राइका का जीवन चरवाहे का जीवन है।
( च) राहकों को अपने आने-जाने के समय की गणना करनी पड़ती है कि किस समय कही के लिए निकलना है तथा कब कहीं से वापसी करना है। ये सरता म किसानों से मैत्री करते चलते है जिससे उन्हें पराई के लिए खेत मिल पाते है तथा इसके एवज में खेतों को खाद उपलब्ध हो जाती है।
9 हिमाचल प्रदेश के गद्दी गड़रियों के जीवन का वर्णन करें।
उत्तर-जम्मू-कश्मीर के गुज्जर बकरवाल की भाँति हिमाचल प्रदेश के गद्दी गड़रियों का भी जीवन ऋतु-प्रवास के चक्कर से बंधा हुआ है, अर्थात् गर्मियों में वे ऊँचे पहाड़ों की ओर प्रस्थान करते हैं और सर्दियों में नीचे की ओर, (अर्थात् हिमालय की निचली पहाड़ियों या शिवालिक की पहाड़ियों की ओर) प्रस्थान करते हैं।
अप्रैल के महीने में वे उत्तर की ओर अपनी यात्रा शुरू कर देते हैं और कुछ समय ले लाहौल और स्पीति में ठहरते हैं और जब ऊँचे पहाड़ों की बर्फ पिघलने लगती है और पर्वतीय मार्ग खुल जाते हैं तो वे ऊँचे पर्वतों की ओर चल देते हैं।
सितम्बर के महीने में जब ऊँचे पहाड़ों पर फिर बर्फ गिरने लग जाती है तो ये गद्दी गडरिये नीचे की ओर लौटना शुरू कर देते हैं। कुछ समय वे लाहौल और स्पीति के गाँवों में व्यतीत करते हैं। यहाँ वे ग्रीष्म ऋतु की फसलें (जैसे- चावल आदि) काटते है और शरद ऋतु की फसलें (जैसे- गेहूँ, जौ, चना आदि) बोते हैं।
तत्पश्चात् वे अपनी भेड़-बकरियों के साथ आगे नीचे शिवालिक की पहाड़ियों की ओर चले जाते हैं और अप्रैल के शुरू तक वहीं अपने पशुओं को चराते फिरते हैं। इस प्रकार हिमाचल प्रदेश के इन गद्दी लोगों का जीवन ऋतु-प्रवास से प्रेरित रहता है। अप्रैल में ऊँचे और सितम्बर में नीचे आने का उनका दौरा चलता रहता है और यही इनके जीवन-चक्र की मुख्य विशेषता है।
10 पहाड़ों पर विचरने वाले चरवाहें और दक्षिण के चरवाहों में क्या अंतर होता है?
उत्तर-दोनों को ऋतु परिवर्तन के चक्र के अनुसार अपनी चरवाहा कार्यवाइयों को बदलना पड़ता है, परन्तु उनकी इन कार्यवाइयों में काफी अंतर होता है।
वनों में घूमने वाले चरवाहों को, जैसे जम्मू-कश्मीर के गुज्जर बकरवाल और हिमाचल प्रदेश के गद्दी चरवाहें को सर्दी-गर्मी से अपनी गतिविधियों में परिवर्तन लाना पड़ता है वहीं दक्षिण के चरवाहों को बरसात और सूखे मौसम से प्रभावित होकर अपनी गतिविधियों को निश्चित करना होता है।Jac

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