राष्ट्रीय एकता पर निबंध

राष्ट्रीय एकता की आवश्यकता

राष्ट्रीय एकता परिचय

आर्थिक सामाजिक और राजनैतिक असमानता किसी भी देश के राष्ट्रीय एकता में बहुत बड़ी बाधा बन जाती है। देश में उस इस तरह की असमानता का मूल कारण है अहंकार, स्वार्थ, उच्च-नीच ,लूट- मार, दंगा -फसाद ,और भेद -भाव, । इसलिए राष्ट्र की एकता के लिए अहंकार और स्वार्थ को मन से निकाल देना चाहिए । जातीय असमानता भी राष्ट्रीय एकता का बहुत बड़ा बाधा है। उसका भी मूल कारण अहंकार ही है ।

  •   अर्थ और महत्त्व,
  • और महत्त्व भारत में विभिन्नता, 
  • अनेकता में एकता,
  • राष्ट्रीय एकता के क तत्त्व
  • परस्पर संघर्ष के दुष्परिणाम,
  • समाधान।


अर्थ और महत्व

 राष्ट्रीय एकता का तात्पर्य है- राष्ट्र के सब घटकों में भिन्न चारों और भिन्न आस्थाओं के होते हुए भी आपसी प्रेम, एकता और भाईचारे बना रहना। ‘एकता’ शब्द ‘अविरोध को प्रकट करता है। अर्थात देश में ताएँ हो फिर भी सभी नागरिक राष्ट्र-प्रेम से ओतप्रोत हैं। देश के नागरिक होने से  पहले भारतीय हो, फिर हिंदू या मुसलमाना राष्ट्रीय एकता का भाव देश रूपी भवन में सीमेंट का काम करता है। जैसे भवन में ईंट, लोहा, बजरी गरि भिन्न-भिन्न पदार्थ होते हैं, और सीमेंट उन्हें जोड़े रहता है।

उसी प्रकार लीय एकता का भाव समूचे राष्ट्र को शक्तिशाली, शांत और समद्ध बनाता है। भारत में विभिन्नता-भारत अनेकताओं का देश है। यहाँ अनेक धर्मो जातियाँ वर्गों संप्रदायों और भाषाओं के लोग निवास करते हैं। यहाँ के लोगों का रहन-सहन खान-पान और पहनावा भी भिन्न है। भौगोलिक, सामाजिक और आर्थिक असमानताएँ भी कम नहीं हैं। 

अनेकता में एकता

भारत में विभिन्नता होते हुए भी एकता या अविरोध विद्यमान है। यहाँ सभी जातियाँ घुल-मिलकर रहती रही हैं। यहाँ प्रायः लोग एक-दूसरे के धर्म का आदर करते हैं। आदर न भी करें तो दूसरे के प्रति सहनशील हैं। भारत की यह दृढ मान्यता है कि –

‘एकं सत्यं विप्राःबहुधा वदन्ति।’ 

अर्थात् सत्य एक है। उस तक पहुँचने के मार्ग भिन्न-भिन्न हैं। गीता में उसी दृष्टि को श्रेष्ठ कहा गया है जो अनेकता में से एकता को पहचानती है। 


राष्ट्रीय एकता के बाधक तत्त्व

भारत की राष्ट्रीय एकता के लिए अनेक खतरे हैं। सबसे बड़ा खतरा है- कुटिल राजनीति । यहाँ के राजनेता ‘वोट-बैंक बनाने के लिए कभी अल्पसंख्यकों में अलगाव के बीज बोते हैं, कभी आरक्षण के नाम पर पिछड़े वर्गों को देश की मुख्य धारा से अलग करते हैं। कभी किसी विशेष जाति, प्रांत या भाषा के हिमायती बनकर देश को तोड़ते हैं।

जम्मू काश्मीर का विशेष दर्जा हो, खालिस्तान की माँग हो, आसाम या गोरखालैंड की पृथक्ता का आंदोलन हो, सबसे ऊपर वोट के प्रेत मँडराते नजर आते हैं। इस देश के हिंदू, मुसलमान, सिख, ईसाई सभी परस्पर प्रेम से रहना चाहते हैं, लेकिन भ्रष्ट राजनेता उन्हें बाँटकर रखना चाहते हैं। राष्ट्रीय एकता में अन्य बाधक तत्त्व हैविभिन्न धार्मिक नेता, जातिगत असमानता, आर्थिक असमानता आदि।

परस्पर संघर्ष के दष्परिणाम

 जब देश में कोई भी दो राष्ट्रीय घटक संघर्ष करत है तो उसका दुष्परिणाम पूरे देश को भुगतना पड़ता है। मामला आरक्षण का हो या अयोध्या के राम-मंदिर का, उसकी गूंज पूरे देश के जनजीवन को कुप्रभावित करती है। इतिहास प्रमाण है। आरक्षण के नाम पर देशभर में युवक जल, सड़कें रूकी, संपत्तियाँ नष्ट हई। अयोध्या का प्रकरण देश की सीमाओं का पार करके विदेशों में रह-रहे लोगों को भी कपा गया।

समाधान

प्रश्न यह है कि राष्ट्रीय एकता को बल कैसे मिले? संघर्ष शमन कैसे हो? इसका एकमात्र उत्तर यही है कि –

शांति नहीं तब तक जब तक
 सुख-भाग न सबका सम हो। 
नहीं किसी को बहुत अधिक हो
नहीं किसी को कम हो।। (कुरूक्षेत्र से) 

अर्थात् देश में सभी असमानता लाने वाले कानूनों को समाप्त किया जाए। मुस्लिम पर्सनल लॉ, हिंदू कानून आदि अलगाववादी कानूनों को तिलांजलि दी जाए। उसकी जगह एक राष्ट्रीय कानून लागू किया जाए। सब नागरिकों को एक-समान अधिकार प्राप्त हों। किसी को किसी नाम पर भी विशेष सुविधा या विशेष दर्जा न दिया जाए।

भारत में तुष्टिकरण की नीति बंद हो। राष्ट्रीय एकता को बनाने का दूसरा उपाय यह है कि हृदयों में परस्पर आदर का भाव जगाया जाए। यह काम साहित्यकार, कलाकार, विचारक और पत्रकार कर सकते हैं। वे अपनी लेखनी और कला से देशवासियों को एकता का मंत्र पढ़ा सकते हैं।

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