1857 की क्रांति पाठ 6 दीर्घ उत्तरीय प्रश्न | Ncert Solution For Class 8th History

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1857 की क्रांति पाठ 6 दीर्घ उत्तरीय प्रश्न,Ncert Solution For Class 8th History

1857 की क्रांति पाठ 6 अतिलघु उत्तरीय प्रश्न के उत्तर
1857 की क्रांति पाठ 6 लघु उत्तरीय प्रश्न के उत्तर
1857 की क्रांति पाठ 6 दीर्घ उत्तरीय प्रश्न के उत्तर

1 1857 की क्रांति के बाद भारत में क्या बदलाव हुए ?
उत्तर-1857 की क्रांति के बाद भारत में निम्नांकित बदलाव हुए-
(क) 1857 ई० के विद्रोह के असफल होने के तत्काल बाद ब्रिटिश क्राउन ने कंपनी से भारत पर शासन करने के सभी अधिकार वापस ले लिया।

(ख) 1 नवंबर 1858 ई० को इलाहाबाद में आयोजित दरबार में लॉर्ड कैनिंग ने महारानी के उद्घोषणा को पढ़ा। जिसमें कहा गया था कि भारत में कंपनी का शासन समाप्त कर भारत का शासन सीधे क्राउन के हाथों में कर दिया गया।

एक भारतीय मंत्री या सचिव तथा 15 सदस्यों वाली इंडिया काउंसिल की स्थापना की गयी। अब भारत में गर्वनर जनरल को वायसराय कहा जाने लगा।

(ग) देश के सभी देशी राज्यों के शासकों को भविष्य में उनके भू क्षेत्र पर कब्जा नहीं करने का भरोसा दिया गया।

उन्हें दत्तक पुत्र अपनाने की स्वतंत्रता दी गई, लेकिन उन्हें ब्रिटेन की रानी को अपना अधिपति स्वीकार करने के लिए प्रेरित कर उन्हें ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन शासन चलाने की छूट दी गई।

(घ) अंग्रेजों ने भारतीयों के धर्म एवं सामाजिक रीति-रिवाजों का सम्मान करने का फैसला किया।

(ङ) भू-स्वामियों और जमींदारों की रक्षा करने एवं जमीन पर उनके अधिकारों को स्थायित्व देने के लिए नीतियों बनाई गई।

(च) विद्रोह के परिणाम स्वरूप भारतीयों में राष्ट्रीय एकता की भावना का विकास हुआ और हिंदू मुसलिम एकता ने जोर पकड़ना शुरू किया। जिसका कालांतर में राष्ट्रीय आंदोलन में अच्छा योगदान रहा।

2 भारतीय ऐसा क्यों सोचते थे कि अंग्रेज उन्हें ईसाई बनाने आए हैं?
उत्तर-कंपनी सरकार ने समाज सुधार के अनेक काम आरंभ किये। इन कार्यों से भारतीय सामाजिक जीवन में अंग्रेजों का हस्तक्षेप बढ़ गया था।

सती प्रथा, नर बली को बंद करने तथा विधवा विवाह को बढ़ावा देने का कानून बनाया गया।

यद्यपि ये कानून भारतीय समाज के लिए हितकर थे, लेकिन रुढ़िवादिता के कारण भारतीयों को लगने लगा कि अंग्रेज भारत में अंग्रेजी सभ्यता का प्रचार चाहते हैं। अंग्रेजी शिक्षा का प्रसार, स्त्री शिक्षा का प्रसार, रेल, डाक तार आदि की व्यवस्था होने से उनकी आशंका और बढ़ती गई।

1856 ई० में पारित विधेयक ने उनकी आशंका को और बल दिया। इस विधेयक के अनुसार ईसाई धर्म स्वीकार करने वाले व्यक्ति को अपनी पैतृक संपत्ति का हकदार माना गया।

ऐसे समय में भारतीय सभ्यता, संस्कृति, भाषा एवं साहित्य के विकास के क्षेत्र में कंपनी द्वारा कोई प्रयास नहीं किये जाने से भारतीय बौद्धिक वर्ग भी कंपनी से नाराज हो गया।

अंग्रेज अपनी नीति के अनुसार अधिकांश भारतीयों को ईसाई धना कर भारत में अपने साम्राज्य को सुदृढ़ करना चाहते थे।

इसी कारण वे ईसाई धर्म स्वीकार करनेवालों को सरकारी नौकरी, उच्च पद एवं अनेक सुविधाएँ प्रदान करते थे।

अंग्रेजों की इस नीति ने हिंदू एवं मुसलमानों में कंपनी के प्रति घृणा भर दी थी। इन्हीं कारणों से भारतीय सोचते थे कि अंग्रेज उन्हें ईसाई बनाने आए हैं।

3 1857 की क्रांति को दबाने के लिए अंग्रेजों ने क्या किया था?
उत्तर-कंपनी ने पूरी ताकत लगा कर विद्रोह को कुचलने का फैसला लिया। उन्होंने इंग्लैंड से और सैनिक मॅगवाए। विद्रोहियों को जल्दी सजा देने के लिए नए कानून बनाए गए और विद्रोह के मुख्य केन्द्रों पर धावा बोल दिया गया।

सितंबर 1857 ई० में दिल्ली दोबारा अंग्रेजों के कब्जे में आ गई। अतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह द्वितीय पर मुकदमा चलाया गया और उन्हें आजीवन कारावास की सजा दी गई।

बहादुर शाह को 1858 ई० में रंगून के जेल में भेज दिया गया, जहाँ उनकी मृत्यु 1862 ई० में हो गई। मार्च 1858 ई० में लखनऊ अंग्रेजों के कब्जे में चला गया। जून 1858 ई० में रानी लक्ष्मीबाई की हार हुई और वह लड़ते-लड़ते शहीद हो गई।

नाना साहेब और बेगम हजरत महल नेपाल भाग गए। तात्या टोपे मध्य भारत के जंगलों में रहते हुए आदिवासियों और किसानों की सहायता से छापामार युद्ध चलाते रहे। जिस तरह पहले अंग्रेजों के खिलाफ मिली सफलताओं से विद्रोहियों को उत्साह मिला था।

उसी तरह विद्रोही ताकतों की हार से लोगों की हिम्मत टूटने लगी। बहुत सारे लोगों ने विद्रोहियों का साथ छोड़ दिया। अंग्रेजों ने भी उनका विश्वास जीतने के लिए हर संभव प्रयास किया।

उन्होंने वफादारों, भू-स्वामियों के लिए इनामों का ऐलान किया। उन्होंने आश्वासन दिया कि उनकी जमीन पर उनके परंपरागत अधिकार बने रहेंगे। विद्रोहियों से कहा गया कि समर्पण के साथ इस बात की घोषणा करते है कि किसी भी अंग्रेज की हत्या नहीं की है, तो वे सुरक्षित रहेंगे।

इसके बावजूद सैकड़ों सिपाहियों, विद्रोहियो, नवाबों और राजाओं पर मुकदमें चलाए गए और उन्हें फाँसी पर लटका दिया गया। jac board