उपनिवेशवाद और आदिवासी समाज पाठ 4 दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर Ncert Solution For Class 8th

उपनिवेशवाद और आदिवासी समाज पाठ 4 दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर Ncert Solution For Class 8th के इस ब्लॉग पोस्ट में आप सभी विद्यार्थियों का स्वागत है, इस पोस्ट के माध्यम से आप सभी को पाठ से जुड़े दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर जो परीक्षा की दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण है, और पिछले कई परीक्षाओं में इस तरह के प्रश्न पूछे जा चुके हैं, उन सभी प्रश्नों के उत्तर इस ब्लॉग पोस्ट में आप सभी को पढ़ने के लिए मिलेगा इसलिए इस पोस्ट को कृपया करके पूरा पढ़ें ताकि आपको परीक्षा की तैयारी करने में और भी आसानी हो सके-

उपनिवेशवाद और आदिवासी समाज पाठ 4 दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर Ncert Solution For Class 8th

उपनिवेशवाद और आदिवासी समाज पाठ 4 अति लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर
उपनिवेशवाद और आदिवासी समाज पाठ 4 लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर
उपनिवेशवाद और आदिवासी समाज पाठ 4 दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

1 कंपनी शासन के बाद आदिवासी इलाके में क्या बदलाव हुए?
उत्तर-ब्रिटिशकाल में झारखंड के आदिवासियों की विशिष्ट संस्कृति भौगोलिक अलगाव, पिछड़ापन और आदिम स्वरूप में स्पष्ट रूपांतरण हुआ। उनकी सीमा विस्तृत हुई और क्षेत्र सीमित हुए।

इस रूपांतरण का राजनीतिक प्रभाव यह हुआ कि झारखंड के आदिवासी जाति के आधार पर अपना कोई पूर्ण विकसित राज्य अथवा स्वशासित क्षेत्र नहीं बना सके। तथापि इस अवधि में नगरीकरण की प्रक्रिया भी स्पष्ट दिखाई पड़ती है।

नगरीकरण का सीधा संबंध परिवर्तन से था। इस अवधि में परिवर्तन बड़े पैमाने पर हुआ, क्योंकि भूमि और आजीविका की तलाश में आने वाले गैर-आदिवासियों ने आदिवासियों को उनके निवास स्थानों से अपदस्थ किया और उन्हें अल्पसंख्यक बना दिया।

आदिवासी अपनी जमीन से वंचित होकर औद्योगिक एवं कृषि मजदूरों के रूप में असम के चाय बागानों तथा दक्षिण बिहार एवं पश्चिम बंगाल के कृषि प्रधान क्षेत्रों में शरण लेने लगे। फलतः आदिवासी बहुल क्षेत्र घटने लगे और अल्प-आदिवासी क्षेत्रों में उनकी पहचान मिटने लगी।

इस युग में आदिवासी समाज तीन वर्गों में बँट गया सबसे ऊपर राजा और जमींदार, मध्य में खुशहाल आदिवासी और सब से नीचे सामान्य आदिवासी।

2 वन कानूनों में बदलाव का आदिवासी समाज ने विरोध क्यों किया ?
उत्तर-आदिवासी समूहों का जीवन जंगलों से जुड़ा हुआ था। अतः वन कानूनों में आए बदलाओं से आदिवासियों के जीवन पर भी भारी असर पड़ा। अंग्रेजों ने सारे जंगलों पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया था तथा जंगलों को राज्य की ।

संपति घोषित कर दिया था। कुछ जंगलों को आरक्षित वन घोषित कर दिया गया। ये ऐसे जंगल थे जहाँ अंग्रेजों की जरूरत के लिए इमारती लकड़ी पैदा होती थी। इन जंगलों समें लोगों को स्वतंत्र रूप से झूम खेती करने, फल इकट्ठा करने या पशुओं का शिकार करने की इजाजत नहीं थी।

इसलिए उनमें से बहुतों को काम और रोजगार की तलाश में मजबूरन 19 दूसरे इलाकों में जाना पड़ा। उनकी स्थिति दयनीय हो गयी। इन्हीं कारणों से बहुत सारे आदिवासी समूहों ने औपनिवेशिक वन-कानूनों का विरोध किया।

उन्होंने नए नियमों का पालन करने से इनकार कर दिया और उन्हीं तौर तरीकों से चलते रहे जिन्हें सरकार गैरकानून घोषित कर चुकी है। कई बार उन्होंने खुलेआम बगावत भी कर दी। 1906 में सोग्राम संगमा द्वारा असम में और 1930 के दशक में मध्य प्रांत में हुआ वन सत्याग्रह, इसी तरह के विद्रोह थे।

3 बिरसा मुंडा ने उलगुलान क्यों किया था ?
उत्तर-1895 में बिरसा ने अनुयायियों से आह्वान किया कि वे अपने गौरवपूर्ण अतीत को पुनर्जीवित करने के लिए संकल्प लें। उस काल्पनिक युग में मुंडा अपने बिरादरियों और रिश्तेदारों का खून नहीं बहाते थे। वे इमानदारी से जीते थे।

बिरसा चाहते थे कि लोग एक बार फिर अपनी जमीन पर खेती करें, एक जगह टिक कर रहें और अपने खेतों में काम करें। अंग्रेजों को बिरसा आंदोलन के राजनीतिक उद्देश्यों से बहुत परेशानी थी।

यह आंदोलन मिशनरियों, महाजनों, हिंदू भूस्वामियों और सरकार को बाहर निकालकर बिरसा के नेतृत्व में मुंडा राज स्थापित करना चाहते थे, क्योंकि इनकी वजह से आदिवासी संस्कृति जीवन-यापन के तरीके नष्ट हो गए थे। लोग भूमिहीन हो गये थे।

इस शोषण से मुक्ति के लिए बिरसा मुंडा ने उलगुलान किया था। वे आह्वान कर रहे थे कि उनके नेतृत्व में साम्राज्य की स्थापना के लिए, दीकुओं को तबाह कर दें। बिरसा केअनुयायी, दीकु और यूरोपीय सता के प्रतीकों को निशाना बनाने लगे।

उन्होंने थाने और चर्चों पर हमले किए औ महाजनों व जमींदारों की संपत्तियों पर धावा बोल दिया। सफेद झंडा बिरसा राज का प्रतीक था।

4 कौन से आदिवासी समूह शिकारी तथा संग्राहक थे ? व्याख्या करें।
उत्तर-शिकारी तथा संग्राहक समूह-
(क) बहुत सारे इलाकों में आदिवासी समूह पशुओं का शिकार चय करके और वन्य उत्पादों को इकट्ठा करके अपना काम चलाते थे। वे जंगलों को अपनी जिंदगी के लिए बहुत जरूरी मानते थे।

उड़ीसा के जंगलों में रहने वाला खोंड समुदाय इसी तरह का एक समुदय था। इस समुदाय के लोग टोलियाँ बनाकर शिकार पर निकलते थे और जो हाथ लगता था उसे आपस में बाँट लेते थे।

(ख) वे जंगलों से मिले फल और जड़े खाते थे। खाना पकाने के लिए वे साल और महुआ के बीजों का तेल इस्तेमाल करते थे। इलाज के लिए वे बहुत सारी जंगली जड़ी-बुटियों
का इस्तेमाल करते थे और जंगलों से इकट्ठा की हुई चीजों को स्थानीय बाजारों में बेच देते थे।

जब भी स्थानीय बुनकरों और चमड़ा कारीगरों को कपड़े व चमड़े की रंगाई
के लिए कुसुम और पलाश के फूलों की आवश्यकता होती थी तो ये खोंड समुदाय के लोगों से ही कहते थे।

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