नौबतखाने में इबादत पाठ16

नौबतखाने में इबादत के लेखक कौन है

नौबतखाने में इबादत extra Question answer

नौबतखाने में इबादत नामक इस पाठ से जुड़ी सभी प्रकार के प्रश्नो का हल इस ब्लॉग में आपको मिलेगा , इस ब्लॉग को पढ़ने के बाद आपको दूसरे ब्लॉग या साइट में ध्यान देने की कोई जरुरत नहीं क्योकि इस ब्लॉग पर पाठ से जुड़ी सभी तरह की महत्वपूर्ण , एवं परीक्षा उपयोगी सवालों का हल सरल भाषा में आपको इस ब्लॉग पर बताया गया है

(1.) पाठ का नाम और लेखक का नाम लिखें।

उत्तर-पाठ का नाम- नौबतखाने में इबादत ।        

लेखक का नाम- यतींद्र मिश्र।

(2.) अमीरुद्दीन किसका नाम था ? उनका जन्म कहाँ हुआ ?

उत्तर-अमीरुद्दीन उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ के बचपन का नाम था। उनका जन्म बिहार के डुमराँव नामक गाँव में हुआ था।

(3.) डुमराँव गाँव किसके लिए उपयोगी है ?

उत्तर-डुमराँव गाँव शहनाई के लिए उपयोगी है। यहाँ वह वस्तु मिलती है जिससे शहनाई बजती है।

(4.) रीड क्या होती है ? इसकी क्या उपयोगिता है ?

उत्तर-रीड, नरकट (एक प्रकार की घास) से बनाई जाती है। यह डुमराँव में सोन नदी के किनारे पाई जाती है। रीड अंदर से पोली होती है। इसी के सहारे से शहनाई को फूंका जाता है।

(5.) उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ के पिता एवं परदादा के नाम लिखें

उत्तर-बिस्मिल्ला खाँ उस्ताद पैगंबर बख्श खाँ और मिट्ठन के छोटे साहबजादें थे। इनके परदादा का नाम उस्ताद सलार हुसैन खाँ था।

(6.) बिस्मिल्ला खाँ किस चीज के नायक थे? वे अस्सी बरस से क्या माँग कर रहे थे?

उत्तर-बिस्मिल्ला खाँ शहनाई से निकलने वाली मंगलध्वनि के नायक थे। वे अस्सी बरस से ईश्वरीय देन के रूप में सच्चे सुर की माँग कर रहे थे।

(7.) बिस्मिल्ला का नमाज और सजदे का क्या उद्देश्य रहता था ?

उत्तर-बिस्मिल्ला खाँ की नमाज और सजदे का उद्देश्य यह रहता था कि वे खुदा से सच्चे सुर की माँग कर सकें। उन्होंने 80 बरस तक पाँचों वक्त की नमाज अदा की। वे सच्चे सुर की इबादत में ही खुदा के आगे झुकते थे।

(8.) वे खुदा से क्या माँगते थे ?

उत्तर-नमाज के बाद बिस्मिल्ला खाँ खुदा से सच्चा सुर माँगते थे , वे एक ऐसा सच्चा सुर चाहते थे जो लोगों की आँखों से सच्चे मोती की तरह आँसू निकल सके।

(9.) बिस्मिल्ला खाँ को किस बात का विश्वास था ?

उत्तर-बिस्मिल्ला खाँ को इस बात का विश्वास था कि खुदा कभी न कभी उन पर अवश्य मेहरबान होगा और वह अपनी झोली से सुर का फल निकालकर उसकी ओर उछालकर कहेगा ले जा अमीरुद्दीन इसको खा ले और अपनी मुराद परी कर ले

(10.) बिस्मिल्ला खाँ किस सुर की तलाश में हैं ?

उत्तर-बिस्मिल्ला खाँ ऐसा सच्चा सुर चाहते हैं जिसमें जबरदस्त प्रभाव हो  जिसे सुनकर लोगों की आँखों से सच्चे मोती की तरह आँसू निकल आए। जिसमें हृदय को झंकृत करने की अद्भुत शक्ति हो।

(11.) बिस्मिल्ला खाँ प्रभु के सच्चे भक्त हैं- सिद्ध करें।

उत्तर-नौबतखाने में इबादत नामक पाठ में कहते है की बिस्मिल्ला खुदा में पूरा विश्वास रखते हैं। इसलिए वे सच्ची भावना और श्रद्धा से उसके द्वार पर माथा झुकाते हैं। उसके दरबार में सजदे करते हैं। उससे प्रार्थना करते हैं कि वह उसे सच्चा सुर बख्शे। उसे विश्वास है कि एक-न-एक दिन खुदा उसकी झोली में सच्चा सुर अवश्य देगा।

(12.) अमीरूद्दीन सब शहनाइयों को खारिज क्यों कर डालता था ?

उत्तर-अमीरूद्दीन सब शहनाइयों को बार-बार बजाकर देखता था  किसी में से भी वैसा मीठा स्वर सुनाई नहीं पड़ता था जैसा कि उसके नाना द्वारा बजाई गई शहनाई में थी। इस कारण वह एक-एक करके सब शहनाइयों को खारिज कर डालता था।

(13.) बालसुलभ हँसी का क्या आशय है ? उनकी यह हँसी कब प्रकट होती थी?

उत्तर- बालसुलभ हँसी’ का आशय है- बच्चों जैसी भोली और निश्छल हँसी बिस्मिल्ला खाँ के चेहरे पर यह हँसी तब प्रकट होती थी, जब वे अपने बचपन या जवानी की मीठी-मीठी यादों को याद करते थे।

(14.) चार वर्षीय अमीरुद्दीन शहनाइयों में से किस शहनाई को खोजता था और क्यों?

उत्तर-चार वर्षीय अमीरुद्दीन अपने नाना के नौबतखाने में रखी अनेक शहनाईयों में से उस शहनाई को खोजना चाहता था, जो उसके नाना बजाया करते थे। उसके नाना बहुत मीठी शहनाई बजाते थे इसलिए वह उन्हीं की शहनाई की तलाश करता था।

नौबतखाने में इबादत के प्रश्न और उत्तर 

(15.) बिस्मिल्ला खाँ की आँखें किस बात पर चमक उठती थी ? 

उत्तर-बिस्मिल्ला खाँ जब अपनी यादों का जिक्र करते थे तब नैसर्गिक आनंद में उनकी आँखें चमक उठती थी।

(16.) अमीरूद्दीन अपने नाना के शहनाई को क्यों ढूँढ़ता था ?

उत्तर-अमीरूद्दीन के नाना रियाज करने के बाद अपनी शहनाई को रखकर चले जाते थे। तब अमीरूद्दीन शहनाइयों की भीड़ में अपने नाना की शहनाई को ढूँढ़ता था।

(17.) काशी को संस्कृति की पाठशाला क्यों कहा गया है ?

उत्तर- काशी संस्कृति की पाठशाला है यहाँ भारतीय शास्त्रों का ज्ञान है, कलाशिरोमणि का रहते हैं, यह हनुमान और विश्वनाथ की नगरी है, यहाँ का इतिहास बहुत है, यहाँ प्रकांड ज्ञाता. धर्मगुरु और कलाप्रेमियों का निवास है।

(18.) “यह एक अलग काशी है’ – लेखक ने ऐसा क्यों कहा है ?

उत्तर-काशी अलग है क्योंकि काशी की तहजीब, बोली, उत्सव, सुख-दुख और सेहरा बन्ना तो अलग हैं ही साथ ही यहाँ के अपने विशिष्ट लोग भी है।

(19.) काशी में सब कुछ एकाकार कैसे हो गया है ?

उत्तर-काशी में संगीत भक्ति से, भक्ति कलाकार से, कजरी चैती से, विश्वनाथ विशालाक्षी से और बिस्मिल्ला खाँ गंगाद्वार से,  मिलकर एक हो गए हैं, इन्हें अलग-अलग करके देखना संभव नहीं है।

(20.) बिस्मिल्ला खाँ सुरों के सिद्धहस्त कलाकार थे- सिद्ध करें।

उत्तर-बिस्मिल्ला खाँ बेसुरे या बेताले नहीं थे। उनकी शहनाई में सरगम था, ताल था, राग था, संगीत के सातों सुर थे। वे अपने उस्ताद की सीख पर शहनाई बजाते थे।

(21.) दुनिया बिस्मिल्ला खाँ को किस तरह पहचानती थी?

उत्तर-नौबतखाने में इबादत के माध्यम से बताया गया है की दुनिया में  बिस्मिल्ला खाँ को उनकी शहनाई के कारण पहचानती थी। जब लोग कहीं शहनाई बजते सुनते तब वे छूटते ही कहते- ये हैं बिस्मिल्ला खाँ । उनकी शहनाई के जादुई स्वर लोगों को सम्मोहित कर देते थे।

(22.) बिस्मिल्ला खाँ की शहनाई में किसका असर था ?

उत्तर-बिस्मिल्ला खाँ की शहनाई में जहाँ संगीत का सरगम, लय, ताल, राग था और संगीत के सातों सुर थे वहीं वे अपने उस्ताद  की सीख पर शहनाई बजाते थे। इन सभी का उन पर असर था।

(23.) बिस्मिल्ला खाँ अपनी शहनाई की प्रशंसा सुनकर क्या कहते थे?

उत्तर-बिस्मिल्ला खाँ अपनी शहनाई की प्रशंसा सुनकर कहा करते थे अलहम दुलिल्लाह अर्थात् तमाम तारीफ ईश्वर के लिए है। वे अपनी सारी प्रशंसा खुदा को समर्पित कर देते थे। इससे उनकी विनम्रता झलकती थी।

(24.) ‘फूंक में अजान की तासीर उतरने’ का आशय स्पष्ट करें।

उत्तर-फूंक में अजान की तासीर उतरने का आशय है- बिस्मिल्ला खाँ की फूंकी शहनाई में बुलंदियाँ उतर आई। जिस प्रकार मुल्ला मस्जिद की छत पर चढ़कर अजान देता है। वैसे ही शहनाई का स्वर ऊँचा होता चला गया।

(25.) शिष्या को किस बात का डर था ?

उत्तर-शिष्या को डर था कि अब्दुल्ला खाँ अपनी फटी तहमद पर टिप्पणी सुनकर कहीं नाराज न हो जाएँ। वह उनका दिल दुखाना नहीं चाहती थी, न ही स्वयं क्रोध का शिकार बनना चाहती थी।

(26.) शिष्या ने खाँ साहब को किस बात के लिए रोका और क्यों ?

उत्तर-शिष्या ने अपने गुरु बिस्मिल्ला खाँ को लोगों के सामने फटी तहमद न पहनने के लिए टोका  क्योंकि वह इसे बिस्मिल्ला खाँ जैसे महान शहनाईवादक का अपमान मानती थी। वह उन्हें गरिमाशाली वस्त्रों में देखना चाहती थी।

(27.) खाँ साहब शिष्या की बात पर क्यों मुसकराए ?

उत्तर-खाँ साहब अपनी शिष्या की बात पर मुसकरा पड़े  उन्हें इसमें अपनी शिष्या की नादानी और सद्भावना दिखाई दी। एक ओर वे शिष्या की सद्भावना पाकर प्रसन्न थे। वहीं दूसरी ओर यह सोचकर चकित थे कि यह शिष्या उनके फटे कपड़ों की ओर क्यों ध्यान दे रही है।

(28.) खाँ साहब ने शिष्या की बात का क्या उत्तर दिया ?

उत्तर-खाँ साहब ने शिष्या की बात का उत्तर बड़े लाड़ से दिया  उन्होंने कहा- पगली, मुझे भारतरत्न शहनाई पर मिला है, लुंगिया पर नहीं। अतः तुम मेरी शहनाई के सुर देखो, लुंगी नहीं।

(29.) खाँ साहब भगवान से क्या प्रार्थाना करते थे?

उत्तर-खाँ साहब भगवान से प्रार्थना करते थे कि वह उन्हें कभी फटा सुर न दे, लुंगिया चाहे फटी दे दे। महर्रम ताजिया और होली-अबीर, गुलाल की गंगा-जमुनी संस्कृति भी एक दूसरे के पूरक रहे हैं। अभी जल्दी ही बहुत कुछ इतिहास बन चुका है। अना आगे बहुत कुछ इतिहास बन जाएगा।

(30.) गंगा-जमुनी संस्कृति किसे कहा गया है ?

उत्तर-हिंदुओं और मुसलमानों की मिली-जुली संस्कृति को गंगा-जमुनी, संस्कृति कहा गया है। इस संस्कृति में मुहर्रम और होली समान भाव से मनाए जाते हैं।

(31.) ‘काशी में मरण भी मंगल माना गया है – आशय स्पष्ट करें।

उत्तर-ऐसी मान्यता है कि काशी में मरने वाला प्राणी स्वर्ग में जाता है। इसलिए लोग। काशी में मरना पसंद करते हैं। 

(32.) काशी में क्या-क्या एक-दूसरे के पूरक रहे हैं ?

उत्तर-काशी में बाबा विश्वनाथ और बिस्मिल्ला खाँ एक-दूसरे के पूरक रहे हैं। वहाँ मुहर्रम-ताजिया और होली-अबीर, गुलाल की गंगा-जमुनी संस्कृति भी एक-दूसरे के पूरक रहे हैं।

(33.) काशी में अभी भी क्या कुछ बचा है।

उत्तर-काशी में अभी भी बहुत कुछ बचा है  काशी आज भी संगीत के स्वर पर जागती है और उसी की थापों पर सोती है। काशी में मरण भी मंगल माना जाता है। काशी आनंद कानन है।

(34.) बिस्मिल्ला खाँ को क्या चीज हैरान और परेशान करती है ?

उत्तर-बिस्मिल्ला खाँ यह देखकर हैरान और परेशान हैं कि काशी में न अब मलाई बरफ वाले रहे, न संगीत, साहित्य और अदब के प्रेमी।

(35.) काशी के जीवन की किस विशेषता पर प्रकाश डाला गया है?

उत्तर-काशी के जीवन की यह विशेषता रही है कि यहाँ बाबा विश्वनाथ और शहनाईवादक बिस्मिल्ला खाँ एक-दूसरे के पूरक हैं। शहनाई के बिना बाबा विश्वनाथ की पूजा अधूरी जान पड़ती है। यहाँ मुहर्रम और होली के त्योहार भी एक-दूसरे के पूरक हैं। दोनों त्योहारों को सभी लोग प्रेमपूर्वक मनाते हैं।

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